इस लेख श्रृंखला को प्रस्तुत करने का उद्देश्य है वेदों से जुड़े अनेकों प्रश्नों का उत्तर देना एवं समाज में फैली भ्रांत धारणाओं का निवारण करना ।

ऋग्वेद मानव सभ्यता के प्राचीनतम ग्रन्थ के रूप में प्रसिद्ध है । यहाँ पर काव्य, तत्वज्ञान, इतिहास, संस्कृति इत्यादि का समन्वय है । जनसामान्य के लिए वेदमंत्रों का अर्थ दुर्बोध रहा है । इसके संबंध में कई प्रश्न भी उठते है।

क्या वेद मंत्रों का अर्थ जानना आवश्यक है या केवल पाठ करने से ही फल प्राप्त होता है?

भारत में वर्तमान में भी अनेक वेद पाठशालाएँ  चलती है जहाँ वेदमंत्रों को याद करवाया जाता है। प्रायः यह छात्र मंत्रों के अर्थ को जानते नहीं है। पूर्वपक्ष का कहना है कि वेद मंत्रों के पाठ से अदृष्टफल प्राप्त होता है, इसीलिए यज्ञ करते समय वेद मंत्रों के अर्थ को ध्यान में लेने की आवश्यकता नहीं है। क्या अर्थ जाने बिना ही यह मंत्र फल प्रदान करते है? 

क्यों  वेदों में बहुईश्वरवाद (अनेक देवी- देवताओं) है?

वेदमंत्रों में इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि, यम, विष्णु, मरुत इत्यादि के नाम सहित अनेक मंत्र है। तो क्या सनातन धर्म अनेक ईश्वरों का मानता है या यह नाम केवल विभिन्न लक्षणों के निर्देशक है? क्या इसमें से कोई एक सर्वोत्तम है? कोई मानते है की ऐसे देवी-देवता होते ही नहीं है, तो क्या स्वर्ग-नर्क केवल कल्पना मात्र है?

वेदों के बारे में भगवद्गीता में विरोधाभास क्यों प्रतीत होता है?

भगवद् गीता का निष्कर्ष है की “मैं (भगवान् कृष्ण) ही वेदों के द्वारा जानने योग्य हूँ” (वेदैश्च सर्वैः अहमेव वेद्यः – भगवद् गीता १५.१५), दूसरी ओर भगवद् गीता के इस श्लोक में उसी का विरोध प्रतीत होता है “वेदों में मुख्यतया प्रकृति के तीन गुणों का वर्णन है” (त्रैगुण्यविषया वेदा: – भगवद् गीता २ .४५)

वेदों को कैसे पढ़े और समझे?

मुझे थोड़ी बहुत संस्कृत आती है। मुझे वेद पढ़ने की बहुत इच्छा है? क्या करूँ? वेद का अनुवाद और भाष्य भी कई लोगों ने किया है। इस में कौन सा प्रमाणित है? केवल गीता या भागवत पढ़ना क्या पर्याप्त नहीं है? मैंने सुना है की स्त्री, शूद्र, द्विजबन्धु इत्यादि वेद पढ़ने के योग्य नहीं है? क्यों उनको वंचित रखा गया?

इन सभी प्रश्नों के उत्तर प्राप्त होंगे आने वाली लेख श्रृंखला में । अगर आप इस जानकारी से प्रभावित हुए तो इसे दूसरों के साथ भी साँझा कीजिये ।

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