हरे कृष्णा, यह एक प्रवचन की प्रतिलिपि है जो कुछ समय पूर्व परम पूज्य भक्ति विकास स्वामी महाराज द्वारा अंग्रेजी भाषा में दिया गया था।

नमः ॐ विष्णु पदाय कृष्ण प्रेष्ठाय भूतले

श्रीमते भक्ति वेदान्त स्वामिन इति नामिने

 

नमस्ते सारस्वते देवे गौर वाणी प्रचारिणे

निर्विशेष शून्य वादी पाश्चात्य देश तारिणे

 

जय श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानन्द

श्री अद्वैत श्रीवासादि गौर भक्त वृन्द

 

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे

 

चेतावनी!

इस वीडियो में ऐसी चर्चा की गयी है, जिससे आपका मन विचलित हो सकता है !

यदि आप ऐसा मानते है कि GBC गलती नहीं कर सकता और वे जो भी करें, वह दिव्य है।

मैं जो भी कहने वाला हूँ, वह परिपक्व भक्तों के लिए है। मैं किसी की निंदा करने वाला नहीं, लेकिन सच्चाई को ठोस तरीके से प्रस्तुत करूँगा। कठिन बातें करने वाली हैं, लेकिन मैं केवल तथ्यों को सामने रखूँगा और उसके आधार पर तर्कसंगत निष्कर्ष पर पहुँचेंगें। मैं किसी का नाम नहीं लेना चाहता, लेकिन ISKCON के कुछ वरिष्ठ भक्तों का नाम लेना जरूरी है।

अच्छा तो यही है कि केवल कृष्ण कथा की जाए।  लेकिन जैसे इतिहास बार बार दोहराया जाता है, विशेष रूप में इस कलियुग में धर्म के इतिहास के अंतर्गत संस्था की, आध्यात्मिक और सामाजिक समस्याओं पर चर्चा की जाती है। कई बार ऐसी चर्चाएँ विचलित करने वाली होती हैं, लेकिन इन पर बात तो करनी ही होगी।

मुझे GBC को तीन मिनट का सन्देश देने के लिए कहा गया था। इसमें Bureau के बारे में अपने विचार रखने थे। Bureau भारत में ISKCON संस्था के कानूनी मामलों की देख रेख करती है।

Bureau का कहना था कि Female Diksha Guru  के विषय में कोई निर्णय लेने से पहले उनसे सलाह ली जाए। GBC ने उनकी बात को अनदेखा किया और एक प्रस्ताव पारित कर दिया जिसमे Female Diksha Guru (FDG) को अनुमति दी गयी। बाद में Bureau  ने GBC को इस प्रस्ताव को निरस्त करने के लिए कहा।

तो ISKCON के इतिहास में यह बहुत महत्वपूर्ण और खतरनाक समय है, जब ISKCON के वरिष्ठ भक्तों में आपसी मतभेद हैं।

मेरा पहला तर्क है कि FDG  के अतिरिक्त एक और अत्यंत महत्वपूर्ण विषय विचार करने योग्य है। इस विषय पर GBC के अधिकतर सदस्य या तो आसुरी या पागलों की तरह व्यवहार कर रहे हैं।   मैं आपको समझाता हूँ।

कालकण्ठ प्रभु मेरे गुरुभाई है जो ISKCON में दीक्षागुरु हैं। वे अमेरिका में रहते हैं। मैं उनको अनेक वर्षों से जानता हूँ।  मैं उनका आदर भी करता हूँ और मैंने कई बार उनकी सहायता भी की है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से एक पत्रकार को अपने विचार बताये। इस पत्रकार ने ब्रिटेन के एक बड़े अखबार में उनके विचार प्रकाशित किये। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि FDG का विरोध  …… मैं आपको बता दूँ कि मैं FDG के पूरी तरह खिलाफ नहीं हूँ। लेकिन जैसे श्रील प्रभुपाद कहते थे कि कोई विलक्षण माताजी जो जाह्नवा माताजी के स्तर पर है, तो ठीक है।

उन्होंने कहा कि FDG का विरोध स्त्रियों से छुपा हुआ द्वेष है। इसका अर्थ है कि आप स्त्री वर्ग से ही घृणा करते हो। तो जो व्यक्ति सभी स्त्रियों से घृणा करता है, वह या तो असुर है या उसका दिमाग पूरी तरह खराब है। उन्होंने यह बात कह तो दी, और FDG पर मतदान करने वाले GBC सदस्यों लगभग पचास प्रतिशत भक्तों ने इसके विरोध में मतदान किया। तो इसका अर्थ है कि GBC के अधिकतर सदस्य, यदि कालकण्ठ प्रभु का कहना सही है, या तो वे असुर हैं जो स्त्रियों से घृणा करते हैं, या फिर उनका दिमाग सही नहीं है।

दूसरी ओर, यदि कालकण्ठ प्रभु द्वारा स्त्रियों से घृणा विषयक बात गलत है, तो वे और उनके समर्थक…. उनकी बात का किसी ने विरोध नहीं किया था, न ही वरिष्ठ भक्तों ने और न ही GBC ने। या तो वे किसी भयंकर भ्रम में हैं कि इस कृष्ण भावनामृत आंदोलन के कई सदस्य स्त्रियों से घृणा करते हैं। वे असुर हैं या पूरी तरह पागल। तो यदि वे इस उन्माद रूपी भ्रम में हैं कि कई सदस्य, जिनमे वरिष्ठ भक्त, कई गुरु, GBC सदस्य और संन्यासी असुर हैं या पूरी तरह पागल हैं। तो इसका अर्थ यह है कि उनका स्वयं का ही दिमागी संतुलन ठीक नहीं है। क्या ऐसा हो सकता है कि इतने सारे वरिष्ठ भक्त स्त्रियों से घृणा करते हैं? ऐसा आरोप लगाने वालों का, यदि उनकी बात गलत है, ही दिमाग ठीक नहीं है।   या वे जानबूझ कर भक्तों पर ऐसा लांछन लगा रहे है जो बहुत ही खराब है।

ऐसा लांछन लगाना, भक्तों पर असुर या पागल होने का आरोप लगाना, क्योंकि आप उनसे सहमत नहीं हैं, ऐसे व्यवहार की आशा तो किसी असुर से ही की जा सकती है। तो ऐसे बयान से ऐसा लगता है कि दोनों पक्षों में से किसी में तो दोष है। यदि कोई ऐसा आरोप लगा सकता है, जो सही नहीं है…. व्यक्तिगत रूप से ISKCON में मुझे तो स्त्रियों के प्रति घृणा दिख नहीं रही…. ऐसा आरोप लगाने से तो यही लगता है जैसे आरोपी ही दूसरे पक्ष के लोगों से घृणा करता है।

 

कुछ भी हो, यह अशुभ है। यदि यह सच है तो यह अशुभ है, बहुत अधिक अशुभ कि ISKCON के इतने सारे वरिष्ठ भक्त असुर या हैं। और यदि यह सही नहीं है और वे केवल झूठे आरोप लगा रहे हैं, तो यह भी अत्यंत अशुभ है कि इतना वरिष्ठ व आदरणीय भक्त ऐसा करेगा। हम republican Vs Democratic के स्तर पर गिर रहे है। यह लगभग घृणा ही है। जो अमेरिका में हो रहा है।

मुझे internet पर कुछ मिला था जो मैं आपको पढ़ कर सुनाता हूँ। यह https://www.theatlantic.com पर उपलब्ध है जो एक प्रसिद्ध अखबार है।

अमरीकी राजनीति में धर्म और धर्म निरपेक्षता का छद्म युद्ध शुरु होने का खतरा है। इसमें हर पक्ष दूसरे को विनाशकारी राजनैतिक शत्रु समझता है, जिसे किसी भी कीमत पर नष्ट किया जाना चाहिए।

तो क्या हमारे यहाँ भी यही हो रहा है? ISKCON में, FDG के समर्थक और विरोधी एक दूसरे को विनाशकारी राजनैतिक शत्रु समझते हैं, जिन्हें किसी भी कीमत पर नष्ट किया जाना चाहिए! तो क्या यह चल रहा है?

अगले वर्ष कौन जीतेगा, The Atlantic आगे लिखता है…… अगले वर्ष कौन जीतेगा, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। नीले और लाल अमेरिका के बीच खाई और अधिक गहरी होगी।

वह बात, जिसका उन्होंने खंडन नहीं किया, उसको चुनौती नहीं दी या GBC के वरिष्ठ सदस्यों द्वारा क्षमा भी नहीं मांगी गयी… यह पूरी रिपोर्ट http://www.dandavats.com पर post की गयी है। यह ISKCON की आधिकारिक या लगभग आधिकारिक site है।

मेरे लिए यह बड़ी हैरानी की बात है कि ISKCON, की आधिकारिक site, जो स्वयं को एक सम्मानित आध्यात्मिक संस्था के रूप में स्थापित करने के लिए प्रयास रत है, वह एक ऐसे report छापेगा जैसे वह इस बात का समर्थन कर रहा है, ऐसा आरोप जिसमे इसके अधिकतर वरिष्ठ औपचारिक सदस्यों पर लांछन लगाया गया है, इसके अनौपचारिक या अन्य वरिष्ठ भक्तों का कहना ही क्या, जो FDG पर GBC के निष्कर्ष से सहमत नहीं हैं।

तो यह http://www.dandavats.com लगभग आधिकारिक ही है। GBC अपने बजट में इसको काफी पैसा देती है, इस website को चलाने के लिए काफी पैसा दिया जाता है। यह site एक प्रकार से प्रचार माध्यम ही है। थोड़ा सरल शब्दों कहें तो यह site संसार के सामने ISKCON का अच्छा पक्ष सामने रखती है।  यद्यपि संसार को परवाह नहीं है कि ISKCON क्या कर रहा है। लेकिन  कम से कम ISKCON के सदस्यों या http://www.dandavats.com की site देखने वाले लोगों के लिए तो फर्क पड़ता है।

तो GBC इस http://www.dandavats.com को ढेर सारा पैसा देखर सहायता करती है, वे लोग स्वयं को पैसा कमाते नहीं हैं, वे मंदिरों से पैसा वसूलते हैं।  तो यदि आप ISKCON को पैसा देते हैं, यदि आप ISKCON मंदिरों में दान देते हैं, तो आप ऐसे काम में सहायता कर रहे हैं जो कहते हैं कि GBC और भारत में ISKCON का नेतृत्व करने वाले भक्त आसुरी या पागल हैं। जिन भक्तों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया।

यह मैं नहीं कह रहा कि GBC में राक्षस और पागल भर्ती हैं, मेरा नाम लेकर गलत बात मत करें। लेकिन स्त्रियों से घृणा वाली उनकी बात का अर्थ तो यही निकलता है। वास्तविक समस्या यह है कि इस बात के समर्थको और विरोधियों में गहरे मतभेद हैं।

GBC निरपेक्ष नहीं है। वह एक सौहार्दपूर्ण हल निकालने का प्रयास नहीं कर रही। वह भद्दे तरीके से एक पक्ष का समर्थन कर रही है। वे स्त्रियों से घृणा वाली बात का प्रचार करके उसका समर्थन कर रही है। इसका अर्थ है कि यह समस्या अब सैद्धांतिक नहीं रही। यह अब राजनैतिक समस्या है। किसी न किसी तरह से इस प्रस्ताव को पारित ही कराना है। यदि ऐसा नहीं है तो GBC इस पर Bureau से चर्चा क्यों नहीं करना चाहती?

यह तो बहुत उपेक्षापूर्ण और घमंडी व्यवहार है। जब Bureau के सदस्य जो कम से कम कानूनी मामलों के वरिष्ठ लोग हैं, भारत में ISKCON के कानूनी डिपार्टमेंट के सदस्य, जब वे कहते हैं – देखिये हम इससे सहमत नहीं हैं। इसमें कुछ गलत है। तो GBC उनको पूरी तरह अनदेखा करती है। और प्रस्ताव को मान्यता प्रदान कर देती है।

तो मुझे इस विषय पर तीन मिनट बोलने के लिए कहा गया था। लेकिन इसमें ज्यादा समय लगेगा।  पहले ही काफी समय हो चुका है। GBC को अपने विचार बताने के लिए, लेकिन वे सुन ही नहीं रहे। यदि वे भारत के वरिष्ठ भक्तों की बात ही नहीं सुनना चाहते, तो वे मेरी बात क्यों सुनेंगें।

 

वे क्यों नहीं सुन रहे? राजनीति। मैं इसे समझाता हूँ। यह अत्यंत गंभीर आरोप है। इसमें कोई संदेह नहीं है। वे इसलिए नहीं सुन रहे क्योंकि उन्हें लगता है कि वे मनमर्ज़ी कर सकते हैं।

  1. Burke Rochford Jr. द्वारा लिखित एक पुस्तक है “Hare Krishna Transformed”. वे विद्वान हैं। अब वे सेवानिवृत हो चुके हैं। लेकिन वे 1970 या 1980 के दशक के आरम्भ से ही तत्परता से अमेरिका में ISKCON की गतिविधियों का अध्ययन कर रहे हैं। उन्होंने “Hare Krishna Transformed” नामक पुस्तक लिखी। उसमे “ISKCON में नारीवाद के विरोध की शुरुआत” नामक एक अध्याय है। ISKCON के कुछ निष्ठापूर्ण सदस्यों द्वारा। इस अध्याय के एक भाग में इस विषय पर चर्चा की गयी है कि कैसे स्त्री विरोधी गुट काम कर रहा है कि GBC पर ऐसे लोगों पर कार्यवाही करने का दबाव बनाया जाये, जो वैष्णव परिभाषा के अनुसार “श्रील प्रभुपाद और भगवान् राम की निन्दा” है। इस पुस्तक में पूरी बात नहीं बतायी गयी। श्रील प्रभुपाद और भगवान् राम के विषय में काफी खराब बातें कही गयीं थीं। स्त्री के समानाधिकारों के समर्थक लोगों द्वारा, जो उस समय ISKCON के सदस्य थे।

स्त्री समानाधिकारों के कुछ विरोधियों द्वारा प्रयास किया गया, जो ISKCON  सदस्य थे, कि GBC इस पर कार्यवाही करे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। “Hare Krishna Transformed” के लेखक ने पुस्तक की पृष्ठ संख्या 157 ने बताया कि उसने इस विषय पर GBC  के एक सदस्य से चर्चा की थी।

मैं आपको सुनाता हूँ कि GBC मेंबर ने क्या कहा – उन्होंने इसका समर्थन क्यों नहीं किया। उन्होंने इसका समर्थन क्यों नहीं किया?  निन्दा का जो विरोध किया गया, उस पर कार्यवाही क्यों नहीं की गयी? उस GBC मेंबर, जिनका नाम नहीं बताया गया, ने कहा कि जानबूझ कर इसको अनदेखा करने में कोई खतरा नहीं था, इसलिए हमने ऐसा ही किया।

राजनैतिक दृष्टि से सुरक्षित!!

तो GBC क्यों ISKCON भारत के नेताओं की बात नहीं सुन रही? क्योंकि उनको लगता है कि यह राजनैतिक दृष्टि से सुरक्षित है। उनको लगता है कि वे मनमर्ज़ी कर सकते हैं। दुर्भाग्य से, यदि सच बोला जाये, तो वर्ष 2000 से, जब ISKCON में “Women Ministry” की स्थापना हुई, यह केवल एक राजनैतिक दल है। स्त्रियों के अधिकारों के नाम पर केवल राजनीति ही हो रही है।

धर्मनिरपेक्ष स्त्रीवादियों की तरह, ये भक्त, मैं यह नहीं कह रहा कि वे भक्त नहीं हैं, लेकिन इन लोगों का कहना कि ISKCON में स्त्रियों के पुरुषों के समान ही अधिकार होने चाहियें।   धर्मनिरपेक्ष स्त्रीवादियों की तरह उन्हें अपनी बात पूरी तरह सही लगती है। इस विषय पर चर्चा की कोई आवश्यकता नहीं है।

उनकी बात 100% सही है। जो भी  सहमत नहीं, वह तो स्त्रियों से घृणा करता है।  यदि आप हमसे सहमत नहीं हैं, तो ऐसा नहीं कि इसके पीछे आपके पास कोई अच्छा तर्क है, ऐसा इसलिए है क्योंकि आप स्त्रियों से घृणा करते हो, आप असुर हो, या पागल हो, या फिर दोनों। ख़ास बात यह है। …. मैं इसको दूसरे ढंग से कहता हूँ। मैंने डिक्शनरी में misogyny शब्द के पर्यायवाची ढूंढे। तो पहला पर्यायवाची ही आया “स्त्रियों के समानाधिकारों का विरोधी”… आप समझे? डिक्शनरी में अंग्रेजी भाषा प्रामाणिक ढंग से समझायी गयी है।  और misogyny का पहला पर्यायवाची ही “स्त्रियों के समानाधिकारों का विरोधी”  है। स्त्रीवादियों ने स्त्रियों के अधिकारों की बात इतनी दक्षता से लोगों के दिमाग में घुसा दी है कि लोग misogyny शब्द का अर्थ ही समझते है.. माफ़ कीजिये।  यदि आप स्त्रियों के तथाकथित समानाधिकारों की बात से सहमत नहीं हैं, तो आप स्त्रियों से घृणा करते हैं। आप तो एक अपराधी की तरह बुरे हैं। आपसे कोई भी बात करने का फायदा नहीं है।  आप गलत हो, गलत हो, गलत हो, और गलत हो। यदि आप इससे सहमत नहीं, तो आप गलत ही हो।

यह ह्रदय पर आघात है। यदि आप पुरुष हो, ऐसा नहीं कि केवल पुरुष ही स्त्रियों के समानाधिकारों के विरोधी हैं, स्त्रियाँ भी हैं।  लेकिन बात यह है कि पुरुष विशेष रूप से जिम्मेदार हैं, यदि आप स्त्रियों की मनमर्ज़ी के रास्ते में में रोड़े अटकाते हो। आप तो स्त्रियों के विरोधी हो। कोई भी पुरुष नहीं चाहेगा कि उसे स्त्री विरोधी समझा जाये। हो सकता है कि ऐसे कुछ लोग हों, स्त्रियों से घृणा करने वाले कुछ लोग हो सकते हैं। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि संसार स्त्रियों से घृणा करने वाले लोगों से भरा पड़ा है।  जैसा कुछ स्त्रीवादी हमें समझाना चाहते हैं।

तो यदि ऐसा कहा जाये कि जब तक स्त्रियों को समान अधिकार न मिलें, तो आप स्त्री विरोधी हो। उनको समान अधिकार देना उचित है, कृष्णभावनामृत में। और फिर हम शरीर थोड़े हैं। तो हमें समान होना ही चाहिए। लेकिन, जैसा पूजनीय श्रील प्रभुपाद ने हमें सिखाया, शास्त्र सिखा रहे हैं, परम्पराएँ सिखा रहीं हैं कि सभी जीव आध्यात्मिक रूप से समान हैं, लेकिन भौतिक दृष्टि से सबके अलग अलग कर्तव्य हैं।

मानव समाज में स्त्रियों और पुरुषों के अलग अलग कर्तव्य हैं। श्रील प्रभुपाद ने एक भी स्त्री को GBC, या मंदिर का अध्यक्ष नियुक्त नहीं किया। या संन्यासी नहीं बनाया। स्त्रियों का अकेले यात्रा करना या  प्रचार करना।  इस विषय पर श्रील प्रभुपाद ने उत्तर दिया, जब उनसे वर्तमान की सामाजिक समस्यायों के विषय में पूछा गया। वे इस बात का उत्तर दे रहे थे कि कृष्णभावना भावित उपाय क्या है। समाज में चल रही समस्यायों विषय में। उनसे पूछा गया कि स्त्रियों के पास तो समान अधिकार नहीं हैं, तो फिर वे संतुष्ट कैसे होंगीं?

श्रील प्रभुपाद ने उत्तर दिया –  सब संतुष्ट रहेंगें।  जैसे हमारी महिला भक्त, कृष्णभावनाभावित, वे सेवा कर रहीं हैं।  उन्हें पुरुषों के समान अधिकार नहीं चाहियें।  यह कृष्णभावना  है। वे मंदिर की सफाई कर रहीं हैं, प्रेम से भोजन बना रहीं हैं। वे संतुष्ट हैं। उन्होंने कभी नहीं कहा कि “मुझे तो प्रभुपाद की तरह प्रचार के लिए जापान जाना है।” वे कभी नहीं कहतीं।  यह बनावटी है। तो कृष्णभावना का अर्थ है, अपने स्वरूप में स्थित रहो। स्त्रियाँ और पुरुष, यदि वे अपने स्वरूप में स्थित रहेंगें, तो कोई भी बनावटी…..

यह उद्धरण 27 मई 1974 के दिन सुबह की सैर के समय वार्तालाप से लिया गया है।

तो उनका कहना है कि ISKCON में Female Diksha Guru होनी चाहियें। अमेरिका या अन्य पाश्चात्य देशों में प्रचार के लिए। क्योंकि आजकल का युवा वर्ग धर्म को इस कसौटी से मापता है कि आप स्त्रियों से कैसा व्यवहार करते हैं। उनका ऐसा कहना है।

कई बार भक्त श्रील प्रभुपाद के पास अभक्तों के प्रश्न लाते थे।  कभी कभी श्रील प्रभुपाद कहते कि वास्तव में आप लोग भी ऐसा ही सोचते हो। 1975 के आसपास, श्रील प्रभुपाद ने ISKCON पर कानूनी हमलों का मजबूती से सामना किया। उन्होंने अपने शिष्यों को कहा कि वे अदालत में पूरे आत्मविश्वास से उनकी पुस्तकों के आधार पर बहस करें, जिससे लोगों को पता चले कि उनकी शिक्षाएँ प्रामाणिक और सैद्धांतिक हैं। प्रभुपाद के शिष्यों को डर लगता था, लेकिन ऐसे हमलों से श्रील प्रभुपाद का उत्साह दुगना हो जाता था, क्योंकि उन्हें शास्त्रों की शिक्षाओं पर पूर्ण विश्वास था, स्त्रियों के अधिकारों समेत हर विषय पर।

उनकी शास्त्रों में प्रगाढ़ श्रद्धा थी। ऐसे विवादों के उभरने पर आवश्यकता है कि हम प्रभुपाद की शिक्षाओं में पूर्ण श्रद्धा रखें।

भगवत गीता यथा रूप श्लोक 7.15 से –  श्रील प्रभुपाद लिख रहे हैं – आध्यात्मिक सभाओं में प्रचार का अर्थ है, शास्त्रों के आधार पर बात की जाए।  अपनी बात को सिद्ध करने के लिए तुरंत शास्त्रों से प्रमाण देना चाहिए।

श्रील प्रभुपाद की पुस्तकों में यह बिलकुल स्पष्ट है कि उनमे कई ऐसी बातें लिखी गयी हैं जो पाश्चात्य देशों के धर्मनिरपेक्ष उदारवादी युवाओं के दृष्टिकोण से पुरुष-प्रधान या स्त्रियों से घृणा मानी जायेंगीं।  लेकिन यदि हम एक क्षण भी ऐसा सोचे कि श्रील प्रभुपाद स्त्रियों से घृणा करते थे, तो हमारी आध्यात्मिक स्थिति बिलकुल बेकार है।

यदि हमारी श्रील प्रभुपाद की शिक्षाओं में श्रद्धा नहीं है, यदि हम उन्हें अपने जीवन में नहीं अपना रहे, और समाज को उन शिक्षाओं के आधार पर नहीं चला रहे, न कि संसार के लोकप्रिय मत के अनुसार, जो श्रील प्रभुपाद की शिक्षाओं के विरुद्ध है। हमें न तो समझौता करना चाहिए, न ही छुपाने का प्रयास, जो श्रील प्रभुपाद ने हमें सिखाया।

श्रीमद भागवतम की श्लोक संख्या 4.18.5 पर श्रील प्रभुपाद की टीका सुनिए – आजकल पूर्ववर्ती आचार्यों और स्वरूप सिद्ध साधुओं की अकाट्य शिक्षाओं का उल्लंघन करना फैशन बनता जा रहा है।

यह विचार कि Female दीक्षा गुरु होनी चाहिए, जिससे हम अमेरिका में प्रचार कर सकें। यह विचार ऐसे मामलों में दक्ष लोगों के अनुसंधान के विरुद्ध है।  उदाहरण के लिए  Pew Research के 2018 के एक अनुसंधान के अनुसार अमेरिका में अब पहले से कई अधिक लोग इस्लाम अपना रहे हैं। कुछ दावों के अनुसार विभिन्न आस्थाओं से 20,000 लोग हर साल इस्लाम अपनाते हैं। यह बात सबको पता है कि सभी रूढ़िवादी धर्मों में इस्लाम, कम से कम ऐसा कहा जाता है, यद्यपि मुस्लिम इसे स्वीकार नहीं करते।

सभी रूढ़िवादी धर्मों में इस्लाम स्त्रियों से व्यवहार के मामले में सबसे कुख्यात है। यह विचार कि हमें स्त्रियों के विषय में आधुनिक धर्मनिरपेक्ष उदारवादी विचारधारा के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना चाहिए, अन्यथा हम अमेरिका में कृष्णभावनामृत का प्रचार-प्रसार नहीं कर पायेंगें।

यह इस अकाट्य ऐतिहासिक तथ्यों को भी अनदेखा करता है कि जितने भी प्रमुख व प्रसिद्द धर्म हैं, उनमे स्त्रियों के विषय में परम्परागत रूप से लगभग समान विचार ही हैं। जिसे इस आधुनिक उदारवादी धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण से स्त्रियों पर अत्याचार कहा जा सकता है। पुरातन परम्पराओं पर हमला किया जा रहा है।

क्या होता है, जब हम किसी को बताएँ कि स्त्री-पुरुष सब समान हैं। स्त्रियाँ कीर्तन का नेतृत्व कर सकतीं हैं और ब्रह्मचारी उनके चारों ओर नाच सकते हैं। हम महिला GBC और महिला गुरु को बताएँ कि हमें बहुत अच्छा लग रहा है और वे इस आंदोलन के सदस्य बनेंगें। ऐसे नहीं होता कि लोग ISKCON के सदस्य बनें, केवल इसलिए कि हम बाकी पागल संसार के ही समान हैं। लेकिन जब वे अंततः, भगवान् न करे, कृष्ण न करे, मैं व्यंग कर रहा हूँ। यदि वे कभी श्रील प्रभुपाद की पुस्तकें पड़ेंगें, किसी की स्वलिखित जीवनी न पढ़ कर, जिसमे कृष्णभावनामृत अत्यंत अस्पष्ट तरीके से और अनेक सैद्धांतिक समझौते करके प्रस्तुत किया गया है।

यदि वे कभी श्रील प्रभुपाद की पुस्तकें पढ़े, यदि उन्हें यह सच्चाई पता चल जाये कि प्रभुपाद वास्तव में क्या कह रहे हैं। आमतौर पर यदि लोग लम्बे समय तक किसी संस्था से जुड़े रहें, तो उन्हें पता चल ही जाता है, यदि वे थोड़ा गंभीर हों, तो उन्हें पता चल जायेगा कि प्रभुपाद वास्तव में क्या कह रहे हैं। तब उनके मन में उन लोगों के प्रति आदरभाव समाप्त हो जायेगा और वे झूठ बोलने वाले ऐसे लोगों का साथ छोड़ देंगें। वे पूरी ईमानदारी से ऐसे व्यक्ति की शिक्षाओं नहीं बता रहे, जिनका अनुयायी होने का वे दावा करते हैं।

यदि हम कहें कि हमारी प्रमाणिकता श्रील प्रभुपाद और परम्परा की शिक्षाओं का पालन करने से है, और यदि हमें पता चले कि इस आधार पर प्रामाणिक होने का दावा करने वाले लोग, वास्तव में खुद ही इसका पालन नहीं कर रहे, वे बुरी तरह पथ भ्रष्ट हो गए हैं। तो हम ऐसे लोगों के अनुयायी क्यों बनना चाहेंगें जो स्वयं ही ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों की शिक्षाओं का पालन नहीं कर रहे, जिनके बल पर वे प्रामाणिक होने का दावा करते हैं।

स्त्रियों संबधित यह समस्या भागवतम के 5वे स्कंध के ब्रह्माण्ड की सरंचना और चन्द्र अभियान के विवाद के समान है। पड़े लिखे लोगों के लिए समकालीन विचारधारा में इन बातों को समझना कठिन है। लेकिन यह शास्त्रों और हमारे संस्थापक आचार्य की शिक्षाओं में दिया गया है।  हम कैसे इससे मुँह मोड़ सकते हैं? हम इसको काट कर अलग नहीं कर सकते, हम कर तो सकते हैं, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से बात बनती नहीं कि हम उन हिस्सों को काट कर अलग कर दें, जिन्हें हम पसन्द नहीं करते। तो अब होगा क्या? एक संस्था के स्तर पर हम  दिखावा करें कि हम श्रील प्रभुपाद की शिक्षाओं का पालन कर रहे हैं, लेकिन हम उनकी कई शिक्षाएँ स्वीकार न करें। तब हम बेकार बन जायेंगें। आचार्येर मत येइ, सेइ मत सार, ताँर आज्ञा लङ्घि’ चले, सेइ त’ असार ( चैतन्य चरितामृत आदि लीला 1.12.10)

आचार्य का मत आध्यात्मिक जीवन का आधार होता है। जो इसका निरादर करता है, वह बेकार बन जाता है। तो हम क्या कर रहे है? हम कर क्या रहे हैं, श्रील प्रभुपाद की शिक्षाओं से खिलवाड़ करना, भ्रमित लोगों की गलत धारणाओं के अनुसार इसमें बदलाव करना। चाहे वे संख्या में कितने ही अधिक क्यों न हों। करोड़ों टिमटिमाते सितारों के अच्छा एक चन्द्रमा है। हमें निष्ठावान शिष्य चाहिए, जिन्हें

यस्य देवे परा भक्तिर यथा देवे तथा गुरु

तस्यैते कथिता हि अर्थाः प्रकाशन्ते महात्मन

जिन्हें पूर्ण श्रद्धा है, गुरु और शास्त्र प्रदत्त हर बात में। शास्त्र द्वारा दी गयी का अर्थ है कृष्ण द्वारा दी गयी। जिन शिष्यों की श्रद्धा आंशिक है, उन्हें संस्था का नेतृत्व नहीं करना चाहिए। वे गुरु को धोखा देंगें और गुरु ने जिस धर्म की शिक्षा दी है, वे उसे बदल देंगें। ईसाई धर्म और Paulianity में ऐसा ही हुआ। यदि हमें विश्वास नहीं है, यदि हम छुपाना चाहते हैं, हम श्रील प्रभुपाद की शिक्षाओं पर भरोसा नहीं करते, तो उत्पात एव कल्पते।

श्रुति स्मृति पुराणादि पञ्चरात्रिक विधिं विना,

ऐकान्तिकी हरेर भक्ति उत्पात एव कल्पते।

श्रील प्रभुपाद ने हमें जो सिखाया वह उनके सनक भरे विचार नहीं थे। यह सब शास्त्र पर आधारित है। यदि हम उनका पालन नहीं करना चाहते, और भक्ति करना चाहते हैं, तो इस श्लोक के अनुसार, जो निस्संदेह श्रील प्रभुपाद ने ही हमें सिखाया, तो हमारी तथाकथित भक्ति समाज में केवल उत्पात ही मचाएगी।

मैं भगवत गीता यथा रूप के श्लोक संख्या 3.31 से श्रील प्रभुपाद की व्याख्या पढ़ रहा हूँ। हो सकता है कि हम पूरी तरह निपुण न हों, फिर भी हमें श्रद्धा के सहारे आगे बढ़ते रहना चाहिए। भगवान् की नित्य शिक्षाओं में……… प्रभुपाद लिखते हैं  – एक साधारण व्यक्ति जिसकी भगवान् की नित्य शिक्षाओं में पूर्ण श्रद्धा है, यदि वह  इन निर्देशों का पालन नहीं भी कर पाए, तो भी वह कर्मफल के बन्धन से मुक्ति प्राप्त कर लेता है। कृष्ण भावनामृत के प्रारम्भ में संभव है कि एक भक्त भगवान् के सभी निर्देशों  का पूरी तरह पालन न कर पाए, लेकिन क्योंकि वह इस सिद्धांत से द्वेष नहीं करता, और हार व हताशा का विचार किये बिना निष्ठापूर्वक सेवा में लगा रहता है, निश्चित रूप से वह शुद्ध कृष्णभावनामृत के स्तर पर उन्नति करेगा।

तो यदि कोई भक्त हरेक निर्देश का पालन न कर पाए, लेकिन क्योंकि हम शास्त्रों के निर्देशों से द्वेष नहीं कर रहे, हम शुद्ध कृष्णभावनामृत के धरातल पर आ सकते हैं। यह बात कि अमेरिका में इस्लाम सबसे तेजी से बढ़ने वाला धर्म है, ईसाईयों के विभिन्न गुटों में मोर्मोन्स  …… अधिक रूढ़िवादी ईसाई,  मोर्मोन्स या जेहोवा ईसाईयों को पूरी तरह ईसाई नहीं मानते। लेकिन ये दोनों गुट इस्लाम के बाद सबसे अधिक तेजी से बढ़ रहे हैं। तो इस्लाम, मोर्मोन्स और जेहोवा समुदायों के लोग बहुत अधिक पुरुष प्रधान हैं, अपने दृष्टिकोण में। पुरुष प्रधानता से तो स्त्रीवादियों को अत्यधिक घृणा है। यह विचार कि सामाज में पुरुषों का वर्चस्व हो।

लेकिन मैंने इंटरनेट पर एक सर्वे देखा था। मैं देखना चाहता था कि क्या चल रहा है। अमेरिका में सबसे तेजी से बढ़ने वाले धर्म इस्लाम नहीं है। बल्कि कोई धर्म ही नहीं है, यह नास्तिकता है। लोग अधार्मिक बन रहे हैं। वे अपने को पूरी तरह नास्तिक घोषित न भी करें, लेकिन उनमे से कई स्वयं को आध्यात्मिक तो मानते हैं, लेकिन धार्मिक नहीं।

वे किसी भी धर्म के साथ जुड़ना नहीं चाहते।  वे अपने आप में ही स्वयं को धार्मिक समझते हैं।

तो ये ऐसे लोग हैं जो समर्थन करते हैं, मुझे ऐसा लगता है, जब हम आधुनिक पाश्चात्य युवाओं की बात करते हैं, हम ऐसे लोगों की बात करते हैं जो आध्यात्मिक तो बनना चाहते हैं, लेकिन धार्मिक नहीं। जो शरण नहीं लेंगे। उनमे से अधिकतर, विशेष रूप से युवा, अधार्मिक, कोई धर्म नहीं। ये ऐसे लोग हैं जिन्होंने सोच रखा है कि हम किसी भी धर्म के साथ नहीं जुडेंगें। ये वही लोग हैं जो इस बात का समर्थन करेंगे कि हम सब तो एक हैं। हर वस्तु एक है। स्त्री पुरुष समान हैं। हर वास्तु एक है। जबकि स्त्री पुरुषों को समान अधिकार देने की बात किसी भी पारम्परिक धर्म की शिक्षा नहीं है। यहाँ तक कि बौद्ध धर्म में भी, जो धर्म है ही नहीं, उसमें भी यह विचार नहीं है। पारम्परिक मायावाद भी इसका समर्थन नहीं करता। तो यह स्त्रीवाद, समान अधिकार मार्क्सिस्म से आये हैं। यह उनकी एक उपशाखा है, सांस्कृतिक मार्क्सिस्म, जो लगभग नास्तिकता ही है। इससे सहमत होना बहुत खतरनाक है। तो यह विचार कि फीमेल दीक्षा गुरु की आवश्यकता है, अमेरिका में प्रचार के लिए, देखिये यह इस्लाम के लोगों में प्रचार के लिए उपयुक्त नहीं है, जो कि बहुत जगह फैला हुआ है। यह अफ्रीका में प्रचार के लिए उपयुक्त नहीं है। चीन, रशिया, जहाँ स्त्रीवाद पर समाज में बहुत अधिक चर्चा नहीं होती। इन सभी स्थानों में, जिनकी मैंने बात की है। भारत में, अनेक पाश्चात्य प्रभावों के कारण, आप राजीव मल्होत्रा की  Breaking India पुस्तक पढ़ सकते हो।

और अरविन्द नीलकंठ ने काफी मोटी पुस्तक लिखी है, जिसमे अनेक विचारों के बारे में बताया है, जिन्होंने प्रभावित किया है।  उसने प्रभावशाली ढंग से भारतीय संस्कृति को नीचा दिखाने  का प्रयास किया है। इनमे पाश्चात्य विचार शामिल हैं, जो यह दिखाते है कि हर भारतीय पारम्परिक प्रथा गलत है। हम कह सकते हैं कि यह तो अमेरिका के लिए अच्छा है। और जोर शोर से समान अधिकारों की बात करें, लेकिन अमेरिका भी तो बदल सकता है, क्योंकि गच्छति इति जगत। भौतिक जगत की परिभाषा ही यही है कि यह सदा बदलता रहता है। और समय की बात है कि यह वापिस पुराने ढर्रे पर जाएगा, इसमें कोई शंका नहीं है, क्योंकि समाज ऐसे ही चलता है। घड़ी के पेण्डुलम की तरह, कभी यहाँ तो कभी वहाँ। इसमें सैंकड़ो वर्ष लग सकते हैं, लेकिन समझने की बात यह है कि वेदिक संस्कृति वेदों पर आधारित हैं, जो शाश्वत हैं, वे कभी नहीं बदलते। यह भी एक कारण है कि लोग लोग धर्म की शरण लेते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इसका ठोस आधार है, यह बदलता नहीं। यह हज़ारों वर्ष पुराना है। यह हवा के रुख से नहीं बदलता। नहीं तो धर्म की क्या आवश्यकता है? फिर तो यह मनोरथ के समान है, यह केवल मन के धरातल पर स्थित है।

यदि हम मान भी लें कि फीमेल दीक्षा गुरु होना अमेरिका में प्रचार के लिए अच्छा है, तो यह शास्त्र और परंपरा के विरुद्ध है। जैसे रजोगुणी सुख है, यह लम्बे समय तक टिकेगा नहीं। प्रारम्भ में यह अच्छा लग सकता है, लेकिन यह वास्तविकता पर आधारित नहीं है, कृष्ण की इच्छा अनुरूप, जो कृष्ण की शिक्षा है, यह लम्बे समय तक चलेगा नहीं।

ऐसा हो सकता है कि हम कई भक्त बना लें, मुझे तो इसमें भी शंका है। वे अनेक भक्त बनायेंगें, हम उनसे हरे कृष्ण जप करवा लेंगें। लेकिन यदि वे शुरु से ही श्रील प्रभुपाद की पुस्तकों में दी गयीं शिक्षाओं के विरुद्ध होंगें, तो फिर वे किस तरह के भक्त हैं?वे शुद्ध भक्त नहीं बनेंगें। हम लोग चरणचिन्हो का अनुसरण करके शुद्ध भक्त बन सकते हैं।  महाजनो येन गतः स पन्थाः। …. पूर्ववर्ती आचार्यों के चरणचिन्हो का अनुसरण करना। वे उन निर्देशों को स्वीकार नहीं करेंगें, जहाँ प्रभुपाद कह रहे हैं कि स्त्री को कभी भी स्वतन्त्र नहीं रहना चाहिए।  यदि गुरु एक स्वतन्त्र महिला है, तो वे इसे कैसे स्वीकार करेंगें?

यह शेखचिल्ली के सपने जैसा है, यह सोचना कि अमेरिका में अचानक प्रचार का विस्फोट हो जायेगा, बस इसलिए क्योंकि हमारे यहाँ कुछ महिलाएँ दीक्षा देती हैं। किस बात की आवश्यकता है, ढेर सारा हरिनाम, सभी भक्त इसी काम में लग जाएँ, व्यापक नगर कीर्तन, श्रील प्रभुपाद की पुस्तकों का व्यापक वितरण। दूसरे भक्तों की पुस्तकें भी हो सकती हैं, जो कृष्णभावना के सन्देश को स्पष्टता से प्रस्तुत करें।  जैसे Coming Back, वह एक अच्छी पुस्तक तो है, लेकिन ऐसी पुस्तकें जो स्पष्ट और बिना समझौते के कृष्णभावनामृत का सन्देश बताएँ। और दृढ़तापूर्वक व निष्ठा से प्रचार करो। त्याग की भावना, जिससे प्रेरित होकर अनेक भक्त जुड़े। यह वही कृष्णभावना है, हम उसी जीवात्मा से व्यवहार कर रहे हैं। सांस्कृतिक बदलाव? हाँ, हमें सांस्कृतिक बदलावों को समझना चाहिए। लेकिन कृष्णभावनामृत का मूलभूत सिद्धांत कभी नहीं बदलता।

इस प्रोजेक्ट में विषय में आपका क्या विचार है? अनेक भक्त बनाने के लिए?  आप क्या सोचते हैं? अनेक भक्त। हम क्या सोचते हैं, जब हम कहते हैं कि हम अनेक भक्त बनाना चाहते हैं? श्रील प्रभुपाद कहते हैं कि लोग लाखों की संख्या में हमारे कृषि समुदायों के सदस्य बनेंगें। यदि अमेरिका में हमारे मंदिर में एक वर्ष में दस भक्त भी जुड़ जाएँ, तो यह बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाती है, अद्भुत। यदि हम दस पाश्चात्य लोगों को एक वर्ष में दीक्षा के स्तर पर ले आएँ, तो हमें लगता है कि यह मंदिर जो ऊर्जा से भरा है। प्रभुपाद कहते हैं कि लोग लाखों की संख्या में हमारे कृषि समुदायों में रहने आयेंगें। यदि हमने प्रभुपाद की शिक्षाओं का निष्ठापूर्वक पालन किया होता। वर्णाश्रम के बारे में, कृषि समुदाय। निश्चित रूप से अनेक भक्त जुड़ने के लिए प्रेरित होते।

सादा जीवन उच्च विचार। आधुनिक सुविधाओं से दूर। अपना भोजन स्वयं उगाओ।  प्राकृतिक। गाओं की रक्षा करो। तो क्या पाश्चात्य देशों में मुख्य सांस्कृतिक बदलावों के साथ हमें बदलना जरुरी है? या हम कृष्ण की योजना पर भरोसा रखें? कृष्ण की सांस्कृतिक योजना, जो वर्णाश्रम धर्म है। मैं इस विषय में बाद में विस्तार से बात करूँगा। मैंने राजनीती शब्द का प्रयोग किया, जो बहुत खराब है। यह काफी गंभीर आरोप है। इसमें कोई शंका नहीं कि स्त्रीवाद, स्त्रियों के समान अधिकारों का समर्थन कुछ लोग इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वे महिलाएँ हैं। ये लोग इस्कान में पहले भी राजनीति कर रहे थे और अब भी कर रहे हैं। यह काफी गंभीर आरोप है। लेकिन इस पर लिखित दस्तावेज़ उपलब्ध हैं।

मैं Burke Rochford की पुस्तक से दोबारा पढ़ रहा हूँ। “Hare Krishna Transformed”. यह अत्यंत महत्वपूर्ण पैरा है। कृपया ध्यान से सुनिये। यह इस्कान से असंबंधित विद्वान की टिप्पणी है, जो इस्कान के प्रति अनुकूल भाव रखता है। भक्तों के प्रति अनुकूल भाव, कुल मिला कर।  वह एक विद्वान् है। वह अपने लेखों में निरपेक्ष विचार व्यक्त करता है, काफी हद तक। उससे ये आशा की जाती है। चलो। उसने लिखा – इस्कान में महिलाओं की स्थिति पर होने वाली राजनीति स्पष्ट संकेत कर रही है….. राजनीति शब्द पर ध्यान दीजिये।  इस्कान में महिलाओं की स्थिति पर होने वाली राजनीति स्पष्ट संकेत कर रही है कि कृष्ण आन्दोलन अमेरिकन प्रमुख संस्कृति के अनुसार ढलता जा रहा है। इस्कॉन संगठन की नीतियाँ अब पूरी तरह महिला और पुरुष भक्तों के समान अधिकारों समर्थन करती हैं।  ऐसा सांस्कृतिक बदलाव…… ऐसा सांस्कृतिक बदलाव…… यह बदल गया है। प्रभुपाद के समय ऐसा नहीं था। जो उन्होंने हमें सिखाया।  ऐसा सांस्कृतिक बदलाव अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह संकेत दे रहा है कि किस प्रकार परम्पराएँ अब इस्कॉन की धार्मिक संस्कृति की नींव नहीं रहीं। लैंगिक समानता अपनाने की होड़ में, इस्कॉन के नेताओं ने इस संस्था को आधुनिक उदारवादी संस्कृति के प्रमुख गुण में ढाल दिया है….  लैंगिक समानता की लड़ाई, जो GHQ द्वारा शुरु की गयी थी, धर्म के परंपरागत वेदिक धारणाओं को स्थापित करने के लिए।  दूसरे शब्दों में एक गुट था जो धर्म की वेदिक धारणाओं पर जोर दे रहा था। जिसका GBC ने खण्डन किया था। Burke Rochford ने कहा – लैंगिक समानता की लड़ाई ने एक पैंडोरा की पिटारी खोल दी, जो शायद अब हमेशा खुली रहे। कृपया बहुत ध्यान से सुने।  इस्कॉन में महिलाओं की जिम्मेदारियों और स्थिति पर बहस से ग्रंथों पर प्रभुपाद की व्याख्याओं पर गंभीर प्रश्न चिन्ह लग गए हैं , साथ ही साथ कृष्ण के शुद्ध प्रतिनिधि के रूप में उनकी प्रमाणिकता भी संदेह के घेरे में है।

यह बात कि इस्कॉन नेता श्रील प्रभुपाद के प्रतिनिधि के रूप में दृढ़तापूर्वक फैसला नहीं कर पाए, इस बात का प्रमाण है कि प्रभुपाद का गुरुत्व सम्पूर्ण नहीं है। Burke Rochford आगे कह रहा है….  श्रील प्रभुपाद की शिक्षाएँ अब सोचने और व्यवहार में लाने के लिए मार्गदर्शक मात्र ही हैं, अब वे “परम सत्य” नहीं रहीं। प्रभुपाद की शिक्षाएँ अब परम सत्य नहीं हैं।  वे तो बस मार्गदर्शक हैं – सोचने और करने के लिए। परम्पराएँ इस्कॉन में लगातार एक अनदेखे कोने में लगती जा रही हैं।  जैसे जैसे यह हो रहा है, प्रमुख अमेरिकन सभ्यता के एक व्यवहारिक सांस्कृतिक विकल्प बनने का स्वप्न धराधायी हो जायेगा। तो यहाँ Burke Rochford का उद्धरण समाप्त होता है। जो लोग 1990 से पहले इस्कॉन से जुड़े थे, उन्हें याद होगा कि किस प्रकार इस्कॉन समकालीन धर्मनिरपेक्ष समाज के विकल्प के रूप में उभर रही थी। प्रमुख अमेरिकन सभ्यता के एक व्यवहारिक सांस्कृतिक विकल्प बनने का स्वप्न धराधायी हो जायेगा। क्योंकि हम उस सभ्यता का ही हिस्सा बन जायेंगें, बहुत हद तक।

तो यह जानकारी हमें एक मित्र विद्वान से प्राप्त हुई कि कई वर्षों तक हमारे नेताओं ने इस्कॉन की दिशा बदल दी, उदारवादी व धर्मनिरपेक्ष विचारों को श्रील प्रभुपाद की शिक्षाओं पर प्राथमिकता देकर, और श्रील प्रभुपाद की योजनाओं को त्याग कर एक व्यावहारिक सामाजिक विकल्प को चुना।

अब मैं रविन्द्र स्वरूप दास के एक प्रकाशित लेख में से कुछ पढ़ रहा हूँ। वे कई वर्ष तक GBC के सदस्य थे। यह लेख ISKCON Communication Journal में प्रकाशित हुआ था। यह Vedabase में भी उपलब्ध है। वे कह रहे हैं कि कृष्णभावनामृत आधुनिक स्वभाव से इतना बेमेल है कि यदि हमने इसे नष्ट नहीं किया, तो यह हमें नष्ट कर देगा। मैं इसे दोबारा पढ़ता हूँ। कृष्णभावनामृत आधुनिक स्वभाव से इतना बेमेल है कि यदि हमने इसे नष्ट नहीं किया, तो यह हमें नष्ट कर देगा।

रविन्द्र स्वरूप प्रभु के 1977 के भगवद्दर्शन पत्रिका में प्रकाशित एक लेख से एक और उद्धरण है। अभी अभी एक चिन्तित ईसाई गुट ने ईसाई धर्म की मुख्यधारा का आंकलन किया।  सबसे बड़ा आध्यात्मिक धोखा एक ऐसा ईसाई धर्म है जिसे संसार के सांचे में इतना अधिक ढाल दिया गया है कि इसकी प्रमाणिकता के सभी विशिष्ट गुण इसमें से निचोड़ कर निकाल दिए गए हैं, एक ऐसा ईसाई धर्म तो वैकल्पिक सभ्यता है,  सामाजिकता की दृष्टि से अप्रासंगिक, लोकमत का अनुसार सही, और आध्यात्मिक रूप से मृत। GBC के सदस्यों को तो सबसे अधिक पता होना चाहिए कि श्रील प्रभुपाद की शिक्षाएँ क्या हैं। क्योंकि GBC का एकमात्र कर्तव्य, उनके आस्तित्व का एकमात्र कारण, श्रील प्रभुपाद की शिक्षाओं को अमल में लाना है। यह बात तो स्पष्ट है कि श्रील प्रभुपाद वर्णाश्रम धर्म चाहते थे। Female दीक्षा गुरु बनाना तो श्रील प्रभुपाद के आदेश को नकारना है। श्रील प्रभुपाद तो चाहते थे की उनके अनुयायी वर्णाश्रम धर्म स्थापित करें। ऐसा नहीं करना, गुरु के आदेश की अवहेलना करना है। और ऐसी बात को बढ़ावा देना जो इसके बिलकुल विरुद्ध है। वह क्या है? विरुद्ध का अर्थ है कि वर्णाश्रम धर्म में सबका विशिष्ट कर्तव्य है। महिलाओं की इस संस्था में एक विशिष्ट भूमिका है।  महिला दीक्षा गुरु की शुरुआत एक आखिरी धमाके के समान है। यह आखिरी तो नहीं होगा क्योंकि किसे पता कि ये कल और क्या नया गुल खिला दें। यह एक भारी हमले की तरह है, श्रील प्रभुपाद की शिक्षाओं के विरुद्ध GBC का अघोषित युद्ध, वर्णाश्रम धर्म के विषय में। यह  अत्यंत गंभीर आरोप है, जो की सही भी है। लेकिन जैसे Burke Rochford का कहना है कि इस्कॉन के नेता श्रील प्रभुपाद के प्रतिनिधि के रूप में दृढ़तापूर्वक काम नहीं कर सके, जो इस बात का संकेत है कि प्रभुपाद की प्रमाणिकता सम्पूर्ण नहीं है। GBC कई वर्षों से ऐसे ही काम कर रही है।

GBC में लैंगिक समानता, आप सभाओं की फोटो देख सकते हैं। जहाँ सभी GBC सदस्य गोल मेज पर बैठे हैं। वहाँ दो संन्यासी और एक महिला, फिर तीन संन्यासी और एक महिला। स्त्री-पुरुष एक साथ बैठे हैं। यह तो…. मैं बोलूँ भी तो क्या कहूँ? निश्चित रूप से यह स्त्री-पुरुषों की परंपरागत भूमिकाओं के अनुरूप तो नहीं है। यह वर्णाश्रम के अनुरूप भी नहीं है। जब श्रील प्रभुपाद हमारे बीच मौजूद थे, तो इसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था। हमारे आंदोलन के लिए यह अत्यंत हानिकारक है जो मानव समाज में सर्वोत्तम आचरण का आदर्श स्थापित करना चाहता है, शास्त्रों की शिक्षाओं के अनुरूप। जहाँ स्त्री-पुरुष अलग अलग रहते हैं।

हो सकता है कि लोग इसे न सुनना चाहे। लेकिन इसे अमल में लाने के लिए हम कर्त्तव्यबद्ध् हैं, क्योंकि श्रील प्रभुपाद ने ऐसा करने का निर्देश दिया है। दुर्भाग्य से GBC ने वर्णाश्रम धर्म स्थापित करने के हर प्रयास को दबाने का प्रयास किया है, जिसको स्थापित करना इस्कॉन का कर्तव्य है। सुनियोजित ढंग से, केवल अनदेखा ही नहीं किया, बल्कि इसको आधिकारिक इस्कॉन नीति बनाने के किसी भी प्रयास को दबा दिया। मुझे यह उन भक्तों से पता चला जिन्होंने इसे GBC के एजेंडा में लाने का प्रयास किया था। कई वर्षों से GBC एक महत्वपूर्ण कार्य में व्यस्त है, जिसे Strategic Planning (नीति निर्धारण) कहते हैं। मुझे ठीक से याद नहीं कि कितने वर्ष, लेकिन कम से कम  10 वर्ष तो हो ही गए होंगें। Strategic Planning, जिसमे दर्जनों बैठकें हुईं, भक्तों के हज़ारों घण्टे लग गए। निश्चित रूप से लाखों डालर खर्च किये गए।

हवाई जहाज़ के किराए, खाना, होटल आदि। इनमें वर्णाश्रम धर्म की बात तक नहीं हुई। यह तक नहीं कहा गया कि चलो बाद में बात करते हैं, बिलकुल नामोनिशान तक मिटा दिया। राजनीति की बात….. राजनीति पर दोबारा बात करते हैं। GBC द्वारा महिला दीक्षा गुरु का प्रस्ताव पारित करना। यह Shastric Advisory Committee के 2005 के परामर्श पर आधारित है। लेकिन उस प्रस्तावना के हरेक तर्क की तो पहले धज्जियाँ उड़ाई जा चुकी थीं। जिस भक्त ने Shastric Advisory Committee के गठन का सुझाव दिया था, जो इसके पहले अध्यक्ष भी थे, उनका नाम है पूर्ण चन्द्र महाराज। उनका अब देहान्त हो चुका है। उन्होंने बाद में त्यागपत्र दिया था, इस कमेटी से। उन्होंने मुझे बताया, एक निजी वार्तालाप में।  उन्होंने मुझे बताया था कि उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा, क्योंकि उनका अनुभव था….. वे इस कमेटी को बनाने वालों में से एक थे। इसके पीछे विचार था कि GBC को शास्त्रों व ब्राह्मणों के मार्गदर्शन में कार्य करना चाहिए। उच्च विचार होने चाहिए, केवल राजनैतिक दांवपेच नहीं। तो उन्होंने मुझे बताया था कि उन्होंने त्यागपत्र दिया क्योंकि उनका अनुभव था कि GBC को इस कमेटी के ब्राह्मणोचित परामर्शों में कोई रुचि नहीं थी। वे चाहते थे…. यदि यह कमेटी कोई सुझाव लेकर आती, जो GBC पहले से ही उसे लागू करना चाहती थी, तो वे उसे स्वीकार कर लेंगें। नहीं तो वे उसे ठन्डे बस्ते में दाल देते। उन्हें इस कमेटी के सुझाव की कोई परवाह नहीं थी। वे इस कमेटी को एक ऐसे डिपार्टमेंट की तरह प्रयोग कर रहे थे, जो केवल लोगों को दिखाने के लिए था। कि हम तो शास्त्र और निरपेक्ष ब्राह्मणों के मार्गदर्शन के अनुसार चल रहे हैं, लेकिन वास्तव वे उन्हें इसकी रत्ती भर परवाह नहीं थी। मैं आपको बिलकुल वैसे ही बता रहा हूँ जैसा पूर्णचन्द्र महाराज ने मुझे बताया। इस कमेटी के एक और संस्थापक सदस्य ने भी मुझे बाद में अलग से बताया, पूर्णचन्द्र महाराज से अलग।  एक और संस्थापक सदस्य, जिनका देहांत हो चुका है, सुहोत्र महाराज ने भी मुझे लगभग यही बात बताई।  वे बहुत दुःखी थे कि किस प्रकार उन्होंने और दूसरे भक्तों ने अनुसंधान पर इतनई मेहनत की लेकिन GBC को इससे कोई सरोकार नहीं था। वे इसे तभी स्वीकार करते थे जब इस कमेटी का सुझाव उनके पूर्वाग्रहों के अनुरूप होता था कि क्या करना चाहिए। वे मार्गदर्शन ले नहीं रहे थे, वे तो केवल इस कमेटी का मार्गदर्शन लेने का दिखावा करना चाहते थे।

मुकुन्द दत्त प्रभु एक और विद्वान और साधु वृत्ति के भक्त हैं। उनका राजनीति से कोई सरोकार नहीं है, और वे भी इस कमेटी के संस्थापक सदस्य थे। उन्होंने भी त्यागपत्र दिया था, या उनके शब्दों में कहें तो उन्हें Shastric Advisory Committee से निकाल बाहर किया था। जब उन्हें पता चला कि GBC को इस कमेटी के सुझाव में न तो कोई रुचि थी, बल्कि महिला दीक्षा गुरु के विषय में उन्होंने इस कमेटी पर दबाव डाला कि वे इसके समर्थन में तथाकथित प्रमाण जुटाएँ। वे नहीं चाहते थे कि इस विषय में निरपेक्ष जांच की जाए। यदि आप Shastric Advisory Committee को गूगल पर search करेंगें, तो आपको एक लम्बी लिस्ट मिलेगी जिसमें मुकुंद दत्त प्रभु के इस कमेटी में हुए अनुभव संक्षेप में दिए गए हैं।

कि कैसे उनको बड़ी सफाई से बाहर का रास्ता दिखाया गया। उन्होंने जो भी कहा, कैसे उस पर बिलकुल ध्यान नहीं दिया गया, क्योंकि उनकी रिसर्च, श्रील प्रभुपाद की पुस्तकों के अध्ययन और परम्पराओं के विश्लेषण पर आधारित उनका दृष्टिकोण यह था कि महिला दीक्षा गुरु को अनुमति नहीं देनी चाहिए। लेकिन वे ऐसा नहीं चाहते थे। उनको बहाना लगाकर बाहर निकाल दिया, इतनी भयंकर राजनीति थी। Shastric Advisory Committee की दो सदस्य तो खुद ही महिला दीक्षा गुरु की उम्मीदवार थीं। उन्हें इस रिसर्च में भाग नहीं लेना चाहिए था। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। राजनीति की दलदल!! आप गूगल पर अवश्य देखना।

Shastric Advisory Committee पर गूगल या जो भी search engine आप प्रयोग करते हैं। तो इस्कॉन में स्त्रीवाद पर प्रारम्भ से ही उनका रवैया धर्मनिरपेक्ष स्त्रीवाद से बिलकुल मिलता जुलता है। हम तो पूरी तरह सही है, चर्चा की कोई गुंजाइश ही नहीं है। यदि आप हमसे सहमत नहीं, तो आप ही गलत हो। बस किसी तरह इस प्रस्ताव को पारित करो। मानो गले में जबरदस्ती घुसाना। जिसकी लाठी उसकी भैंस।

ये अत्यंत गंभीर आरोप हैं।  मैंने इस वीडियो में पहले ही चेतावनी दी थी। यदि आप इसे पचा नहीं सकते, तो इसे मत देखिये।  हो सकता है कि इस समय तक आप सोच रहे हों, कि मैं सबसे बड़ा अपराधी हूँ, मैंने कई गंभीर आरोप लगाए हैं। लेकिन कृपा करके आप इस बात पर विचार करें, यदि आप निरपेक्ष होने का लेशमात्र भी प्रयास कर रहे हैं, कि वरिष्ठ भक्तों में अकेला नहीं हूँ, जो महिला दीक्षा गुरु का विरोध कर रहे हैं। भारत में इस्कॉन के लगभग सभी नेता भी विरोध कर रहे हैं। तो मैं अकेला नहीं हूँ। यदि आप मुझे इस्कॉन का शत्रु मानते हैं, तो फिर इस्कॉन के कई शत्रु हैं।  मैं तो नहीं मानता, यदि मैं स्त्री विरोधी नहीं हूँ या गंभीर मानसिक रोग से ग्रस्त नहीं हूँ, मैं स्वयं को इस्कॉन का शत्रु नहीं मानता। मैं तो एक मित्र या सदस्य के नाते बोल रहा हूँ, जो इस संस्था के हित के विषय में सोच रहा है। यदि किसी को  गाडी चलाते समय नींद आ जाये, या कोई पीकर गाडी चला रहा हो, तो आप उस पर चिल्लाते हो कि वह स्वयं पर नियंत्रण करे, गाड़ी पर नियंत्रण करे।  इससे आप उसके शत्रु नहीं बन जाते। आप तो उसके मित्र हो, यद्यपि बाहरी रूप से वह शत्रु लग सकता है। तो लांछन लगाना तो मानसिक दृष्टि से समस्या का सरल समाधान है। जो ऐसी बात करते हैं, वे हमारे शत्रु हैं, वे कट्टरवादी हैं, वे आतंकी हैं। पिछले कई वर्षों में मेरे बारे में लोगों ने ऐसी बाते कहीं हैं। यह मानसिक दृष्टि से आसान हो सकता है कि मेरे जैसे लोगों को एक छोटे से डब्बे में बंद करके समुद्र के गहराई में फैंक दिया जाए।

लेकिन यह तो केवल आपके मन में ही घटित हो रहा है। जो भी व्यक्ति हमारे शास्त्रों और परम्पराओं का सूक्ष्म अध्ययन करेगा, कि इनमे क्या कहा जा रहा है? वैष्णव समाज में स्त्रियों के विषय में क्या विचार हैं? तो आप देखेंगे कि हमारी बात शास्त्रों के अनुसार है।  हम मानते है कि श्रील प्रभुपाद ने कुछ सांस्कृतिक बदलाव किये, जब वे पश्चिम देश के बर्बर समाज में आये। वेदिक दृष्टि से पाश्चात्य सभ्यता बर्बर या असभ्य है। दूसरे शब्दों में वे म्लेच्छ हैं। यह सारी बातों पर मैंने अपनी एक पुस्तक “Mothers and Masters” में चर्चा की हुई है। GBC ने कृपावश एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमे उन्होंने लगभग ऐसा कहा  कि इस पुस्तक को छापने का अर्थ है कि मैं श्रील प्रभुपाद की शिक्षाओं से सहमत नहीं हूँ।

लेकिन यदि आप इसे पढ़े तो पूछ सकते हैं कि इसमें क्या है जो श्रील प्रभुपाद की शिक्षाओं के विरुद्ध है? यह श्रील प्रभुपाद के उद्धरणों से भरी हुई है। यह अत्यंत युक्तिपूर्ण ढंग से प्रस्तुत की गयी है। छोड़ो… यह एक और राजनीतिक विषय है। तो हो क्या रहा है? जो इस्कॉन में लैंगिक समानता को बढ़ावा दे रहे हैं, यह तो मार्क्स, फ्रायड, स्त्रीवाद, यहाँ तक कि नास्तिक विचारों से प्रभावित है। देखा जाये तो ये सब विचार नास्तिकतावाद से आ रहे हैं। यदि हम शास्त्रों के अनुगत नहीं है तो इसी को नास्तिकतावाद कहते हैं।

अंग्रेजी के शब्द atheist का संस्कृत में अनुवाद है नास्तिक। लेकिन यदि हम नास्तिक शब्द का अग्रेंज़ी अनुवाद करें, तो इसका अर्थ भगवान् में श्रद्धा न रखने वाला नहीं, बल्कि शास्त्र में श्रद्धा न रखने वाला है, वैदिक शास्त्र में। वेद न मानिया बौद्ध हइल नास्तिक। बौद्धों को इसलिए नास्तिक माना जाता है, इसलिए नहीं कि….. यह चैतन्य महाप्रभु का निर्देश है। इसलिए नहीं कि उन्हें भगवान् में श्रद्धा नहीं है, बल्कि इसलिए क्योंकि वे वेदों को स्वीकार नहीं करते। यदि हम इस्कॉन में स्त्रीवादियों को  शास्त्रार्थ के लिए आमन्त्रित करते हैं, वो वे आते नहीं। मैंने प्रयास किया था।  मेरी पुस्तक “Mothers and Masters” का विरोध करने वालों को मैंने आदरपूर्वक आमन्त्रित किया था, सार्वजनिक चर्चा के लिए। कोई भी नहीं आया। वे आपसे चर्चा नहीं करेंगें क्योंकि उन्हें पता है कि यदि हम प्रभुपाद के निर्देशों पर आधारित चर्चा करेंगें, तो वे कुछ नहीं कर पायेंगें। शास्त्रों के निर्देश। वे  सिद्ध नहीं कर पायेंगें, लैंगिक समानता – गुरु, साधु और शास्त्र के आधार पर। वे प्रभुपाद की कुछ बातों या कार्यों का प्रमाण देकर, ऐसे भक्तों के देखभाल करते समय जो अभी अभी हिप्पी जीवन से बाहर निकले थे। वे म्लेच्छों की भूमि में कृष्णभावनामृत का प्रचार कर रहे थे।

हमें इस स्थिति को भी ध्यान में रखना होगा। तो उन्होंने वैदिक धर्म में जो भी समझौते किये, उन्हें समझौतों के रूप में ही देखना होगा। ऐसा नहीं कि उन्होंने सभी प्रथाओं को ही बदल दिया। कि कृष्ण गलत हैं, वे जो भी शास्त्रों में कह रहे हैं। तो स्वच्छन्द व्याख्या करने का उनका यह प्रयास हमें भागवतम 7वे स्कन्द, 15वे अध्याय के श्लोक संख्या 13 को देखें, तो देखने में तो वह छल धर्म लगता है। धोखे वाला धर्म।

मैं स्वयं को GBC समर्थक मानना चाहता हूँ, यद्यपि मैं अनेक ऐसी बातें कही हैं जो शायद GBC को अच्छी न लगें। लेकिन वे अच्छी इसलिए नहीं लग रहीं, क्योंकि मैंने वो बोला जो GBC ने किया है। मैं यह नहीं कह रहा कि GBC के सारे काम गलत हैं। लेकिन इस विषय में गंभीर समस्याएँ हैं।    मैं स्वयं को GBC समर्थक मानना चाहता हूँ, जो भी स्वयं को श्रील प्रभुपाद का अनुयायी मानता है, तो वह निश्चित रूप से एक ऐसी सुदृढ़ GBC चाहेगा, जिसका वह आँख बंद कर अनुसरण कर सके। सुदृढ़ का अर्थ क्या है? हमें बल कहाँ से मिलेगा? श्रील प्रभुपाद की शिक्षाओं का पालन करने से हममें बल आएगा। नैतिक रूप से भ्रष्ट होकर नहीं, तब हमें कोई बल नहीं मिलेगा।

जिसकी लाठी उसी की भैंस के नियम से, अहंकार वश चर्चा के आमंत्रण को ठुकराना। कोई कुछ समय तक अपनी दादागिरी दिखाए, लेकिन आप श्रील प्रभुपाद की कृपा कभी प्राप्त नहीं कर सकते, जो पूरे विश्व में कृष्णभावनामृत आंदोलन का प्रसार करने के लिए नितान्त आवश्यक है।

इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा, यदि भक्तों को लगे कि उनका गलत मार्गदर्शन किया जा रहा है। उन्होंने श्रील प्रभुपाद के आदर्शों के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया, और जिन लोगों का कर्तव्य था कि वे हमारे इस प्रयास में हमारा नेतृत्व करेंगे, वे हमें भटका रहे हैं। क्रोध आना स्वाभाविक है। क्रोधित होना स्वाभाविक है लेकिन क्रोधित होने का अर्थ है कि लड़ने के लिए हमारा मन करेगा। लेकिन हमें लड़ाई से किसी भी कीमत पर बचना चाहिए। आप कह सकते हो कि आप लड़ाई ही तो कर रहे हो! लेकिन कृपया सुनें।

हमें लड़ाई शोभा नहीं देती। हमें अपना दिमाग ठण्डा रखना होगा। जितना भी हम रख सकें। यह कठिन है। दिमाग ठण्डा रखने का प्रयास करो। इस्कॉन में इतने अधिक कृष्ण भक्त नहीं हैं जो पूरे संसार में कृष्णभावनामृत का प्रसार करना चाहें। जो इसके विरोध में बोल भी रहे हैं, मुझे पूरा विश्वास है कि उनके ह्रदय में कृष्णभावनामृत को पूरे संसार में फ़ैलाने की भावना निहित है। प्रभुपाद की इच्छानुसार। लेकिन उन इच्छाओं में कई मतभेद हैं, और इन इच्छाओं को पूरा कैसे किया जाये। लेकिन हमारी संख्या बहुत अधिक नहीं है। बटवारा हमारे लिए अच्छा नहीं होगा। गौड़ीय मठ को ही देख लो। वह कितनी मज़बूत संस्था थी। वे आपस में लड़ने लगे और उनकी आध्यात्मिक शक्ति नष्ट हो गयी। भगवत कृपा विलुप्त हो गयी कि वे पूरे विश्व में कृष्णभावना का प्रचार कर सकें।

GBC कई बार प्रभुपाद के प्रमाण देती है, विभिन्नता में एकता के विषय में।  वे प्रभुपाद का उद्धरण देते है कि आप मुझे कितना प्रेम करते है, यह इस बात से पता चलेगा कि मेरे जाने के बाद आप आपस में कितना सहयोग करते हो, इस आंदोलन को जीवित रखने के लिए। यह प्रभुपाद लीलामृत में दिया गया है।  लेकिन TKG (तमाल कृष्ण गोस्वामी) की डायरी में दिया गया यह उद्धरण इस संस्था को बनाये रखने के लिए है। यह थोड़ा अलग है। इसमें प्रभुपाद के शब्दों में थोड़ा हेरफेर किया गया है, एक अलग ही अर्थ निकालने के लिए। लेकिन सहयोग ऐसे नहीं होता, जैसे स्टालिन ने सहयोग प्राप्त किया था।

ऐसे नहीं। ब्राह्मणों में सहयोग का अर्थ है बुद्धि सहित। आपसी सहयोग। बुद्धिमत्ता युक्त सहयोग, शास्त्र पर आधारित, शुद्ध बुद्धि के साथ। यदि हमें लगे कि गलत काम हो रहा है, तो हम उसका विरोध करने का प्रयास कर सकते हैं, श्रील प्रभुपाद की महान संस्था को बचाने का प्रयास कर सकते हैं, एक और आधुनिकता में डूबी, खोखली, कमजोर संस्था बनने से। भले ही हमारा प्रयास जटायु की भांति हो। या फिर हम, जैसा बहुत भक्त पहले भी कर चुके हैं, हताश होकर इसे छोड़कर चले जाएँ। पिछले कई वर्षों में मैंने सुना है, भक्त मुझसे कहते थे – ओह, आप इस्कॉन छोड़ रहे हो? आप इस्कॉन छोड़ रहे हो? आप इस्कॉन छोड़ रहे हो? वे सोचते हैं कि मैं इस्कॉन छोड़ने वाला हूँ। अफवाहें फैल रही हैं। हो सकता है कि कुछ लोग चाहते हों कि मैं इस्कॉन छोड़ कर चला जाऊँ। अभी तक तो मैं नहीं गया। मुझे यह तो लगता है, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, जिस इस्कॉन को मैं जानता हूँ, उसने मुझे छोड़ दिया है। मैं इस संस्था से तो नहीं जुड़ा था। Burke Rochford की पुस्तक का नाम ही यही है “बदला हुआ इस्कॉन”…. दोनों बातें आपस में मिल रही हैं। जो भी हो रहा है. अत्यंत अशुभ है। जब इस्कॉन का एक वरिष्ठ भक्त यह कहे कि इस्कॉन के वरिष्ठ भक्तों में अधिकतर स्त्री विरोधी है।  तो हो क्या रहा है? तो हमारी ऐसी दशा हो गयी है कि हममें एक गहरी सैद्धांतिक खाई बन गयी है। दूटन, आपसी फूट। मैं इस संभावना पर पहले ही बोल चुका हूँ। वास्तव में यह पहले भी हो चुका है, और यह होता भी रहेगा। आपसी फूट (जैसा अमेरिका में कहते हैं), इस्कॉन में लगता है कि यह होकर ही रहेगा। हम किस दिशा में जा रहे हैं? जहाँ बड़े स्तर पर दुकड़े होंगें। हमें उसे रोकने का प्रयास करना चाहिए। हमें कम से कम सर्वसम्मति बनाने का प्रयास करना चाहिए।

चाहे इसकी बहुत कम संभावना ही क्यों न हो। क्योंकि यह समस्या जाने वाली तो है नहीं। यह उसी प्रकार है, जैसे 1984 में अमेरिका में मंदिर अध्यक्ष और अन्य भक्तों में, पद में GBC से नीचे, Zonal आचार्य पद्धति को लेकर काफी विवाद हो गया था। ऐसा चल रहा था। इसमें कुछ समय तो लग गया लेकिन क्योंकि विशेष रूप से मंदिर अध्यक्षों ने GBC के निर्देशों की अवहेलना की, उन्होंने GBC के विरुद्ध काम किया। क्योंकि उस समय उनके पास काफी शक्तियाँ थीं। इसमें तीन वर्ष लग गए।  1987 में Guru Reform आंदोलन चला और GBC ने गुरु पद्धति में कई सुधार किये। कई लोगों का विचार था कि ये सुधार अधिक प्रभावी नहीं थे। मेरे कहने के अर्थ है कि लोग परेशान थे, GBC ने इसे दबाने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि जो लोग इससे सहमत नहीं हैं, वास्तव में वे ईर्ष्यालु हैं। लेकिन अच्छी संख्या में भक्त एकत्र हो गए थे, जिन्होंने लगातार इसका विरोध किया। अंततः बदलाव आया। वास्तव में बदलाव आया। चाहे वह इतना महत्वपूर्ण बदलाव नहीं था। जैसा रविन्द्र स्वरूप प्रभु ने बताया कि आवश्यकता ह्रदय परिवर्तन की थी, ह्रदय का शुद्धिकरण। इस्कॉन में उसी वास्तविक बदलाव की आवश्यकता थी। उन्होंने यह बात Guru Reform आंदोलन के नेता के रूप में कही थी।

मेरा कहना है कि हम अनिश्चितता की स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं। स्त्री पुरुषों के दायित्वों की बात तीन वर्ष से काफी पहले से चल रही है, शायद बीस वर्ष से या फिर उससे भी अधिक वर्षों से। हम अनिश्चितता की स्थिति की ओर इसलिए बढ़ रहे हैं क्योंकि चाहे GBC आशा करती है कि इस्कॉन भारत के नेता झुक सकते हैं और उनकी बात मान सकते हैं। GBC ऐसा कह रही है। हमें GBC के अनुसार चलना चाहिए।

चलो महिला दीक्षा गुरु होने दो। हमें ठीक नहीं लग रहा लेकिन हम इसका विरोध नहीं करते। यदि वे इसे मान भी लें,  तो भी यदि कोई व्यक्ति अपनी इच्छा के विरुद्ध जाकर कोई बात मानता है, वह फिर भी अपना पहला मत भूलता नहीं। ह्रदय में वे असंतुष्ट रहेंगें। भविष्य में इससे समस्या आएगी ही। यह तो समस्या को कुछ समय के लिए आगे धकेलने वाली बात है, यदि हम जबरदस्ती ऐसा कोई नियम किसी पर लाद दें, जो लोकप्रिय नहीं है। हो सकता है वह अमेरिका में लोकप्रिय हो। यद्यपि सभी अमेरिकन भक्त इसका समर्थन नहीं करते। लेकिन यदि महत्वपूर्ण नेताओं सहित अधिकतर भक्त इसके विरुद्ध हैं, तो फिर तानाशाही से आप आंदोलन की दिशा बदल नहीं सकते। दूसरी ओर यदि GBC मान जाती है, तो जो लोग इस प्रस्ताव के पारित होने पर घी के दिए जला रहे थे, वे ह्रदय में असंतुष्ट हो जायेंगें और भविष्य में समस्या निश्चित रूप से आएगी।

मैं चैतन्य चरितामृत आदि लीला 12वे अध्याय के 8 वे प्रयार पर श्रील प्रभुपाद की व्याख्या पढ़ने लगा हूँ।  “दैवेर कारण” का अर्थ है  भाग्य या भगवान् की इच्छानुसार अद्वैत आचार्य के अनुयायी दो गुटों में बंट गए। एक आचार्य के शिष्यों ऐसा मतभेद गौड़ीय मठ के भक्तों में भी देखने को मिलता है। प्रारम्भ में, ॐ विष्णुपाद परमहंस परिव्राजकाचार्य अष्टोत्तर-शत श्री श्रीमद भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर प्रभुपाद की मौजूदगी में सभी भक्त मिल कर कार्य कर रहे थे। लेकिन उनके तिरोभाव के बाद भक्तों में मतभेद उभरने लगे।

एक गुट निष्ठापूर्वक भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर के निर्देशों का पालन कर रहा था, लेकिन दूसरे गुट मनमर्ज़ी से अपनी इच्छापूर्ति के लिए अपने विचार गढ़ लिए। मेरा सन्देश, जो आकाश में प्रवाहित हो रहा है, क्या GBC मेरी बात सुनेगी? लगता तो नहीं। लेकिन अपना सन्देश एक बोतल में बंद करके समुद्र में डाल कर देखते हैं। ऐसा होने से पहले, हम भीषण विभाजन के कगार पर खड़े हैं। क्यों न आपस में बात की जाए?

बीते कई वर्षों में एक भी प्रयास नहीं किया गया कि विरोधी दल के सदस्यों को बुलाकर, विरोधी बोलना ही सही होगा, एक दूसरे के विचारों को समझा जाये। इसके विपरीत FDG का समर्थक दल राजनीति में उलझ कर रह गया। मैंने आपको इसकी एक झलक मात्र दिखाई है। मैं  मनघडंत बात नहीं बता रहा। इन सब के प्रमाण उपलब्ध हैं। यह अत्यंत अशुभ है कि वे बस राजनीति में ही लगे हैं। इसमें कोई दैविक प्रेरणा नहीं है। ऐसा क्यों है? मुझे लगता है कि वे जानते हैं कि यदि गुरु, साधु और शास्त्र के आधार पर इन समस्यायों पर चर्चा की जाएगी, उन्हें पता है कि उनके पास कोई ठोस आधार नहीं है। क्योंकि उन्होंने गुरु, साधु और शास्त्र की शरण नहीं ले रखी। वे तो वास्तव में सांस्कृतिक मार्क्सिस्म के सहारे खड़े हैं। और उनका पर्दाफाश हो कर रहेगा। तो वे क्या कर सकते हैं? धर्म निरपेक्ष स्त्रीवादी, वे राजनीति का सहारा लेते हैं। दूसरों का अपमान करना, आप स्त्री-विरोधी हो। किसी न किसी प्रकार उनकी बात पूरी होनी चाहिए।

 

बातचीत का रास्ता क्यों नहीं अपनाया गया?  यही सबसे तर्कसंगत लगता है।

 

मैं हृदयानन्द दास गोस्वामी के विचार पढ़ रहा हूँ।  मैं उनकी बातों से बिलकुल भी सहमत नहीं हूँ, कुछ विषयों पर।  यह ISKCON Communication Journal से है। यदि आप सोचते हो कि मेरे जैसे विद्रोही को इस्कॉन में ऐसी समस्याओं पर सार्वजनिक चर्चा नहीं करनी चाहिए, तो आपको  ISKCON Communication Journal पढ़ना चाहिए। जहाँ हृदयानन्द दास गोस्वामी जैसे बड़े लोग इस प्रकार बोल रहे हैं।

यह उनके विचार हैं।  आवश्यकता है कि इस्कॉन अपने विषय में बुद्धिमानी से सोचना चाहिए। इसका अर्थ है कि हम बुद्धिमानी से नहीं सोच रहे। इस्कॉन अपने विषय में बुद्धिमानी से, सूक्ष्मता व ऐतिहासिक दृष्टि से सोचने की क्षमता विकसित करे। कृपया इसको ध्यान से सुनिए। यह इस समस्या के लिए अत्यंत उपयुक्त है, जिसकी मैं बात कर रहा हूँ। हम बात कर रहे हैं। हम में से कई भक्त बात कर रहे हैं। जब समस्याएँ सिर उठाएँ, हमें पता होना चाहिए कि ऐसी समस्याएँ…. …. मैं भी इसमें कुछ टिप्पणी कर देता हूँ। समान समस्याएँ।  हमें पता होना चाहिए कि ऐसी समस्याएँ  पहले भी कई बार आ चुकी हैं, वैष्णव इतिहास में भी और दूसरी परम्पराओं में भी। हमें पता होना चाहिए कि इसका कारगर उपाय क्या था, और क्यों और किन उपायों से स्थिति और अधिक खराब हो गयी थी और क्यों। बड़ी अच्छा सुझाव है।

ISKCON Communication Journal से एक और बात बताता हूँ। दोबारा रविन्द्र स्वरूप प्रभु के विचार। मैं बहुत स्पष्टता से कह रहा हूँ कि इस्कॉन में दिमाग है ही नहीं। या इसका दिमाग पूर्णतः विकसित नहीं है। मैं आप पर छोड़ता हूँ कि आप इस विषय में क्या सोचना चाहते हो। तो इसका उपाय क्या है? ऋत्विक प्रणाली? नहीं। आप कहोगे कि मेरे सभी विचारों से ऋत्विक वादियों को बहुत बल मिलेगा। लेकिन वह एक और मूर्खतापूर्ण विचार है।  यह गुरु, साधु और शास्त्र सम्मत नहीं है। वे स्वयं को प्रभुपादानुगा कहते हैं, उनका दावा है कि हम ही प्रभुपाद के वास्तविक अनुयायी हैं। लेकिन उन्होंने भी श्रील प्रभुपाद के वर्णाश्रम आंदोलन से धोखा किया, क्योंकि उन्होंने इसे स्थापित करने का कुछ भी प्रयास नहीं किया।

और वर्णाश्रम धर्म के विरुद्ध आचरण करना, इस बेतुके विचार के साथ कि ब्रह्मचारियों समेत सभी को वेतन दिया जाये। इस्कॉन बेंगलुरु के मंदिर, जो पूरे भारत में फैले हैं, वे सभी को वेतन देते हैं। हर व्यक्ति उनका नौकर है। भक्ति ने नाम पर, यह एक व्यापारिक संस्थान है। उनका मुख्य काम ढेर सारा धन एकत्रित करना और सबको पैसा देना है। लेकिन मैं विषय से भटक गया।   1.26.25

यह बात कि हम लोग मिल कर इस पर चर्चा क्यों नहीं करते? बौद्ध धर्म, निर्वाण के कुछ समय बाद…. निर्वाण का अर्थ चले गए, कभी न लौटने के लिए। बुद्ध देव का निर्वाण। एक बौद्ध सभा थी, जिसमे सभी बौद्ध नेता एकत्र हुए।  क्योंकि बुद्ध ने शिक्षाओं को लिपिबद्ध नहीं किया था। लेकिन वे ऐसे अनुयायियों से मिले जो बुद्ध के साथ रहे थे, यह समझने के लिए कि उन्होंने क्या कहा था, हम उसे कैसे समझ सकते हैं, हम उसे जीवन कैसे अपना सकते हैं। तो उन्होंने एक पत्र बनाया जिसमें बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लक्षणों का वर्णन था। भिक्षुओं के लिए नियम …. उनके वहाँ अनेक बौद्ध सभाएँ थीं। बौद्ध धर्म अंततः दो भागों में विभाजित हो गया। दो मुख्य गुट थे, थेरावाद और महायाना। तो उनकी अपनी अपनी सभाएँ थीं। समय समय पर वे ऐसी सभाएँ आयोजित करते थे, जिनमें वे एकत्र होते थे, साथ बैठ कर समय बिताते थे। अलग अलग नेताओं के अलग अलग विचार थे। लेकिन उन्होंने एकसाथ समय बिताया और कहा कि ठीक है कि अलग अलग विचार हैं, लेकिन हमारा मूलभूत सिद्धान्त क्या है, हमारे संस्थापक की शिक्षाओं पर आधारित। मोहम्मद (PBUH) के देहान्त के बाद भी ऐसा ही हुआ। मैं गोली नहीं खाना चाहता। उन्होंने हदीस लिखी, जिसमे लिखा था कि उन्होंने क्या कहा,  क्या किया, क्योंकि उन्हें आदर्श पैगम्बर, ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता है। कुरआन में कुछ ही विषयों पर चर्चा है, तो अलग अलग हदीस के आधार पर इस्लाम में अलग अलग गुट और पुस्तकें शुरु हो गयीं।  ईसाई धर्म में कुछ शताब्दियाँ बीतने के बाद उन्होंने एक सभा बुलाई, जिसमे उन्होंने ईसाई धर्म को पारिभाषित किया।

आधिकारिक रूप से ईसाई धर्म क्या है, और इसके बाहर जो भी है, वह पाखण्ड  है। वे एकत्र हुए, उन्होंने चर्चा की।  वहाँ लोगों के विरोधी विचार भी थे। तो गहन चर्चा करने के बाद, उन्होंने ईसाई धर्म की परिभाषा बनाई। समय बीतने के साथ अलग प्रकार की समस्याएँ उठ खड़ी हुईं। उनकी अलग अलग सभाएँ थीं, कैथोलिक चर्च, कई चर्च टूट कर अलग हो गए। अलग चर्चों की अपनी परामर्श सभाएँ थीं। अभी कुछ समय पहले ही, लगभग 1960 के दशक में, Second Vetican Council कैथोलिक चर्च की आखिरी सभा थी। इसमें कैथोलिक शिक्षाओं, और प्रथाओं के कई बदलाव किये गए। कहने का भाव है कि वे इकट्ठे हुए, और कहा – देखो, समस्या तो है। बाइबल में जीसस के शिक्षाओं के आधार पर इसका सामना  कैसे किया जाये।  वे एकत्र हुए, साथ मिलकर बैठे, क्या करना है, इसका सही अर्थ कैसे निकाले।  हज़ारों पादरी एकत्र हुए, कई महीनों तक, एक वर्ष से भी अधिक समय तक।  उन सबके पास भारी जिम्मेदारियाँ थीं। फिर भी वे एकत्र हुए और चर्चा की। ऐसा नहीं कि एक गुट का बहुमत है तो हम ही सही है। आपको स्वीकार करना ही होगा। इस दृष्टि से तो उनमें हमसे अधिक ब्राह्मणोचित गुण हैं! ब्राह्मण तो मिलकर चर्चा करते हैं। एक और उदहारण है। हम कह सकते है – हमें बौद्ध, ईसाई धर्म से काया सरोकार!! यद्यपि श्रील प्रभुपाद ने कैथोलिक चर्च की कार्यप्रणाली का अध्ययन करने के लिए कहा था।

हमारी परंपरा में, वर्ष 1717 में एक कानूनी पात्र जारी किया गया था, जिस पर मुस्लिम सरकार की मोहर लगी हुई थी। उसमें एक गौड़ीय वैष्णव सभा के निष्कर्ष से सहमति जताई गयी थी। ये लोग कई महीनों तक बैठकर कानूनी प्रावधानों पर चर्चा करते रहे थे।  दो गुट थे – स्वकीय वादी, जिनका कहना था कि राधा-कृष्ण वास्तव में विवाहित हैं। और यह परकीय वाद, जिसमे कृष्ण, राधा और अन्य गोपियों से विवाह किये बिना मिलजुल रहे हैं, वह सही नहीं है। तो यह चर्चा स्वकीया वाद और परकीया वाद में थी। तो दोनों ओर के विद्वान पण्डित एकत्र हुए।

मैं, 1925 में Melville Kennedy द्वारा लिखित एक पुस्तक “The Chaitanya Movement” से पढ़ रहा हूँ। वह एक ईसाई था और गौड़ीय वैष्णवों से द्वेष नहीं करता था। लेकिन वह लिखता है, पूरे बंगाल, उड़ीसा और बनारस से दोनों पक्षों के प्रकाण्ड विद्वान एकत्र हुए। उन्होंने उस समय वैष्णव समाज के सभी लोगों को आमंत्रित किया था। वैष्णव शास्त्रों को बहस का आधार बनाया गया था। इसमें भागवतम पुराण, चैतन्य महाप्रभु की शिक्षाएँ, भागवत पर श्रीधर स्वामी की प्रसिद्द टीका, भागवत के दशम स्कन्द पर सनातन गोस्वामी की टीका, और भी ग्रन्थ थे। वे इस बात से चिन्तित नहीं थे, लोग हमारे बारे में, हमारी नैतिकता के बारे में क्या सोचते हैं। इसका विचार नहीं था। उसको आधार नहीं बनाया।  शास्त्रों को आधार बनाया गया था। भारी भीड़ एकत्र हो गयी थी। यह सार्वजनिक थी। यह बंद दरवाजे में छुपकर नहीं की गयी थी।

यह चर्चा कई महीनों तक जारी रही। उन्होंने जल्दबाज़ी नहीं की। आखिर में परकीया वादियों की जीत हुई।  परिणाम स्वरूप स्वकीय वादियों की प्रतिष्ठा ख़त्म हो गयी, और उन्होंने पूरे देश में अपने शिष्यों का त्याग किया। परम सत्य दो नहीं हो सकता। या तो महिला दीक्षा गुरु प्रारम्भ करके, या तो हम श्रील प्रभुपाद को प्रसन्न करेंगें, या नहीं। कैसे पता चलेगा? श्रील प्रभपाद ने कहा था, यदि आप मुझे जानना चाहते हो, तो मेरी पुस्तकें पढ़ो।

ISKCON Communication Journal से एक और बात बताता हूँ। एक पुस्तक (Not Clear)… की समीक्षा। समीक्षक ने कहा कि  (Not Clear)… इस्कॉन के लिए उपयोगी है, यह जानने के लिए कि किस प्रकार एक संस्था में मतभेद का प्रयोग किया जा सकता है खुले मन से चर्चा की जाए, विरोधी विचारों के सामंजस्य के लिए। यह तो स्पष्ट है कि एक पक्ष तो मैं हूँ। मैं तो करबद्ध प्रार्थना ही कर सकता हूँ, हमारे GBC के आदरणीय सदस्यों के विवेक को। हम आपको ह्रदय से आदर देना चाहते हैं, यद्यपि कई बार आप हमारे लिए इसे अत्यंत कठिन बना देते हैं।

इसको जबरदस्ती लागू मत कीजिये। समय लगाएँ, देखने के लिए कि इस्कॉन किस दिशा में जा रहा है। यदि Rochford की बात सही है कि इस्कॉन अब पश्चिम देशों के उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष समाज की प्रथाएँ अपना रहा है। गुरु, साधु और शास्त्र की शिक्षाओं को त्याग कर।  क्या हम इसी दिशा में अग्रसर होना चाहते हैं? यह FDG शुरू करें या नहीं, से भी बड़ा विषय है। इस्कॉन की दिशा। समय आ गया कि हम समय निकाले। इन सभी विषयों पर गंभीरता से चर्चा करने के लिए। राजनीति छोड़ दीजिये। ब्राह्मणों के समान चर्चा करते हैं। कितना भी समय लगे। मैं पूरी विनम्रता से आपसे यह प्रार्थना कर रहा हूँ। आपको लगेगा कि यह भी कोई विनम्रता है। लेकिन, मेरी प्रार्थना है कि राजनेताओं की तरह व्यवहार मत कीजिये।  ब्राह्मणोचित व्यवहार कीजिये। श्रील प्रभुपाद के पूरे आंदोलन को खतरे में मत डालिये, श्रील प्रभुपाद द्वारा दी गयी पद्धति में कोई भयंकर बदलाव लाकर। उनकी इच्छा थी कि हम वैदिक संस्कृति का प्रसार करें।  सांस्कृतिक विजय प्राप्त करें।

वांछा कल्पतरूभ्यश्च कृपासिन्धुभ्य एव च

पतितानां पावनेभ्यो वैष्णवेभ्यो नमो नमः

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