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और भाई, सब ठीक है न ?

रास्ते पर, पार्क में, या किसी शादी- पार्टी में अक्सर आपने इन शब्दों को सुना होगा – “और भाई, सब ठीक है न ? और आप भी इस बात का औपचारिकता से जवाब दे कर, ये कहते हुए की “हां भाई सब ठीक है” चले जाते होंगे। लेकिन अगर आप इन शब्दों पर जरा सा ध्यान करे तो इसके पीछे की मानसिकता आपको चौका सकती है? जिस पर अगर विचार किया जाए तो जीवन एक अलग दिशा में जा सकता है। आखिर ये शब्द “और सब ठीक है न ?” ये सूचित करते है की कुछ गलत होने की सम्भवना है। इसलिए जब आप किसी व्यक्ति से सुबह सवेरे मिलते है तो या तो वो या आप एक दूसरे से पूछ पड़ते है की सब ठीक है न ? और आप भी इसका जवाब हाँ में दे कर चले जाते है , बिना ये सोचे हुए ही वास्तव में इस संसार मैं कुछ भी ठीक नहीं है और ये सोच कर की सब ठीक है हम खुद को और दुसरो को भी धोका दे रहे है।

आपका और हमारा इस संसार में होना बिलकुल भी ठीक नहीं है! क्योकि इस जगत में हमको जो चीज़ सबसे प्यारी है यानी की “जान ” उसकी ही कोई गारंटी नहीं है , कोई भी कभी भी किसी भी वक्त मृत्यु को प्राप्त हो सकता है। और जैसी ही हमारी मृत्यु हो जाएगी वैसे ही जो भी हमने इतनी मेहनत से बड़ी फैक्ट्री , बड़ा घर , और धन कमाया है वो हमसे छीन जायेगा। तो अब आप हमें बताये की “क्या सब ठीक है ? चलिए अगर आपको हमारी बात पर यकीन नहीं है तो भगवान कृष्ण की बात मान लीजिए जो की भगवद गीता में 8 . 15 में इस संसार को अनित्ये और दुखालयम बता रहे है।

मामुपेत्य पुनर्जन्म दु:खालयमशाश्वतम् ।
नाप्‍नुवन्ति महात्मान: संसिद्धिं परमां गता: ॥ १५

“मुझे प्राप्त कर के महापुरष, जो भक्तियोगी है , कभी भी दुखो से पूर्ण इस अनित्ये जगत में नहीं लौटते, क्योकि उन्हें परम् सिद्धि प्राप्त हो चुकी होती है।”

यंहा पर मैं आपका ध्यान शब्द “दु:खालयमशाश्वतम्” पर लाना चाहूंगा। भगवान ने इस जगत को दुखो से पूर्ण और अनित्ये कहा है। मतलब ये है की इस जगत में जो की दुखो का घर है और जंहा जान से ले कर माल तक सब क्षणिक है वंहा पर भला कोई भी कैसे ठीक रह सकता है? इसी प्रकार भगवद गीता 9. 33 में भगवान कृष्ण फिर से पुष्टि कर रहे है।

किं पुनर्ब्राह्मणा: पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥ ३३

“फिर धर्मात्मा ब्रह्मणो, भक्तो तथा राजऋषियो के लिए तो कहना ही क्या है ! अतः इस क्षणिक दुःखमय संसार में आ जाने पर मेरी प्रेमाभक्ति में अपने आपको लगाओ।”

 

यंहा पर “अनित्यं असुखम शब्द सूचित करता है की भगवान चाहते है की उनके भक्त इस अनित्ये यानी की क्षणिक और दुःख से भरे संसार से मुक्ति के लिए भगवान कृष्ण की भक्ति में अपना जीवन व्यतीत करे। श्रीमद भगवतम पुराण 4. 23 . 28 भी इसी बात का प्रमाण दे रही है –

स वञ्चितो बतात्मध्रुक् कृच्छ्रेण महता भुवि ।
लब्ध्वापवर्ग्यं मानुष्यं विषयेषु विषज्जते ॥ २८ ॥

जो मनुष्ये का शरीर पा कर भी दुःखो से मोक्ष प्राप्त करने का अवसर गँवा देता है वो खुद से ईर्ष्या करने वाला होता है। ऐसा व्यक्ति हमेशा थोड़े से सुख की प्राप्ति के लिए इस संसार मैं संघर्षमय कार्यो को सम्पन्न करने में लगा रहता है। हमे लगता है की बड़ी बड़ी फैक्ट्रियो -विशाल नगरों का निर्माण कर के हम सुखी हो सकते है लेकिन वास्तव मैं इन सब इन्द्रिये तृप्ति से हम भौतिक संसार में और ज्यादा फंस जाते है बिना यह जाने की इन सब का पहल क्षणिक होता है। ‘अन्तवतु फलम तेषां” किसी देवी देवता या फिर किसी उधोग से की हुई तपस्या से प्राप्त फल क्षणिक होते है। और ऐसे योगियों , कर्मियों, ज्ञानियों को भगवान कृष्ण ने अल्पबुद्धि तद्भ‍वत्यल्पमेधसाम् ( BG 7. 23 ) वाला कहा है। इस तरह से 24 घंटे अपनी इन्द्रियों के सुख के लिए फैक्ट्री, बिज़नेस में दिन -रात काम कर के एक दिन मौत के द्वारा धोखा खाते है। ऐसे लोगो से प्रभवित हो कर आम जन भी भगवद गीता और हरे कृष्ण महामंत्र का जप करने के बजाये खुद को कड़ी मेहनत मैं झोक देते है और धोखे का शिकार होते है।और बुद्धिमान कौन है? इसकी जानकारी भी भगवान भगवद्गीता में हमें प्रदान कर रहे है। Bg. 9.22 में भगवान कृष्ण कहते है की।

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ २२ ॥

“किन्तु जो लोग अनन्यभाव से मेरे दिव्यस्वरूप का ध्यान करते हुए निरन्तर मेरी पूजा करते है, उनकी जो आवश्कताये होती है उन्हें में पूरी करता हूँ और जो कुछ उनके पास है उसकी रक्षा करता हूँ। इस श्लोक से स्पष्ट है की जो कोई भी कृष्ण की भक्ति करता है वास्तव मैं वो ही इस संसार में ठीक कहलाने लायक होता है। क्योकि भगवान कृष्ण उस व्यक्ति की रक्षा करने का वचन देते है।”

इसलिए अगर इस संसार में मनुष्ये जीवन को सफल बनाना है तो हम सब को तुरंत भगवान कृष्ण की शरण ग्रहण कर के उनका अनन्य भाव से भजन करना चाहिए। यह भजन की प्रिक्रिया अत्यंत सरल है। आपको सिर्फ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। इस महामंत्र का जप करना है. और फिर कभी आप से कोई पार्टी -पार्क या शादी में पूछे की “और आप ठीक है न ?” तो आप उसे सच बता सकते है की जी हाँ ” में ठीक हूँ और उससे पूछ सकते है की ” पर क्या आप सच में ठीक है ?”

हरे कृष्ण

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