वेद-रहस्य (भाग-2): क्या वेद मंत्रो का अर्थ जानना आवश्यक है ?

ऋग्वेद मानव सभ्यता के प्राचीनतम ग्रन्थ के रूप में प्रसिद्ध है । यहाँ पर काव्य, तत्वज्ञान, इतिहास, संस्कृति इत्यादि का समन्वय है । जनसामान्य के लिए वेदमंत्रों का अर्थ दुर्बोध रहा है । इसके संबंध में कई प्रश्न भी उठते है।

प्रश्न : क्या वेद मंत्रो का अर्थ जानना आवश्यक है या केवल पाठ करने से ही फल प्राप्त होता है?

भारत में वर्तमान में भी अनेक वेद पाठशालाएँ  चलती है जहाँ वेदमंत्रों को याद करवाया जाता है। प्रायः यह छात्र मन्त्रों के अर्थ को जानते नहीं है। पूर्वपक्ष का कहना है कि वेद मंत्रों के पाठ से अदृष्टफल प्राप्त होता है, इसीलिए यज्ञ करते समय वेद मंत्रों के अर्थ को ध्यान में लेने की आवश्यकता नहीं है। क्या अर्थ जाने बिना ही यह मंत्र फल प्रदान करते है?

उत्तर:

जैमिनीसूत्र (कर्ममीमांसा) के मंत्राधिकरण प्रकरण में वैदिक मंत्रों का केवल जप और पारायण करना चाहिए या यज्ञ करते समय मंत्र के अर्थ का भी ध्यान रखना चाहिए इस विषय की चर्चा की गई है। प्रथम सूत्र अथातो धर्म जिज्ञासा  में स्वाध्यायो अध्येतव्य: के अर्थ पर चर्चा की गई है। स्वाध्याय का अर्थ है वेद-अध्ययन। पूर्वपक्ष (सामनेवाले पक्ष) का कहना है कि वेदमंत्रों के पाठ से अदृष्टफल प्राप्त होता है, इसीलिए वेदमंत्रों के अर्थ को ध्यान में लेने की आवश्यकता नहीं है। परंतु वेदमंत्रों में देवता और द्रव्य इत्यादि की बात की गई है, उनको ब्राह्मण ग्रंथों से जाना जाता है, तो फिर वेदमंत्रों के अर्थ को क्यों नहीं जानना चाहिए?  स्वाध्यायो अध्येतव्य: यह एक अनिवार्य आज्ञा है। वेदमंत्रों के अर्थ है और यज्ञ करते समय उनको जानना आवश्यक है। स्वयं वेदमन्त्रों में इस बात की पुष्टि कि गई है।

उत त्वः पश्यन् न ददर्श वाचम् । उत त्वः  शृण्वन् न शृणोत्येनाम् । 

उत त्वस्मै तन्वं विसस्रे जायेव पत्ये। उश्तीः सुवासाः (ऋ सं 10-07-04)

इस ऋचा में प्रथम वाक्य में बताया है गया कि जो वेदों को पाठ करता है, परन्तु व्याकरण और षड् वेदांग (वेदांग – शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्योतिष, छन्द और निरूक्त – ये छः वेदांग है। यह वेदार्थ ज्ञान में सहायक शास्त्र है।) की मदद से उसके अर्थ को जानता नहीं है, वह देखता हुआ भी देखता नहीं है। आगे बताया है, जो वेदों का पाठ करता है, व्याकरण और षड् अंगों के साथ उसका अध्ययन करता है, परंतु कर्ममीमांसा (पूर्वमीमांसा) की मदद से उसके तात्पर्य को जानने का प्रयास नहीं करता है, वह सुनता हुआ भी सुनता नहीं है।

महर्षि पतंजलि व्याकरण-महाभाष्य में लिखते हैं, निष्कारणो धर्मः षडङ्गो वेदः अध्येय ज्ञेयश्च – वेदों का षड़ अंगों के साथ अध्ययन करना चाहिए और उसके तात्पर्य को जानना चहिये।

पूर्वमीमांसा की मर्यादा

पूर्वमीमांसा वेदमन्त्रों के यज्ञ संबंधित अर्थज्ञान को बताती है। इससे हम वेदों के याज्ञिक अर्थ को जान सकते हैं, जैसे की कोई एक यज्ञ में वेदमंत्रों का किस प्रकार से विनियोग है, कौन से द्रव्यों का प्रयोग करना है, कौन से देवताओं का आह्वान करना है, अंग, क्रम इत्यादि। परन्तु वेदार्थ याज्ञिक अर्थ तक ही सीमित नहीं है। चौदहवीं सदी के वेदभाष्यकार सायणाचार्य ने अपने भाष्य को कर्मकांडपरक-अर्थज्ञान तक ही सीमित रखा था। वेदांग, जैमिनी सूत्र, श्रौत  सूत्र इत्यादि की मदद से यज्ञ होते रहे, वेदों के पठन-पाठन की पद्धति भी चलती रही, परंतु इसके आध्यात्मिक पहलू पर ध्यान नहीं दिया गया। आश्चर्य कि बात है कि किसीने संपूर्ण वेद का आध्यात्मिक अर्थघटन नहीं किया। यास्क (वैदिक शब्दकोश “निघण्टु” के भाष्यकार ) वेदमंत्रों के तीन प्रकार के अर्थ को बताते है – याज्ञिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक। यास्क  वेदों के आध्यात्मिक अर्थ के ऊपर विशेष भार देते हैं। वह एक ऋचा के अर्थ को बताते है –

उतत्वं सख्ये स्थिरपीतमाहु: नैनं हि न्वन्त्यपि वाजिनेषु ।

अधेन्वा चरति माययैष: वाचं सुश्रुवान्लामपुष्पाम् (ऋ सं 10-81-05)

जो वेदों के अर्थ को जानता है वह बहुत ही बुद्धिमान हैं, उसके साथ किसीकी तुलना नहीं हो सकती, परंतु जो पाठ करता है और उसके फल और पुष्परूपी अर्थज्ञान को जानता नहीं है, वह दुधारू गाय को छोड़कर नकली गाय से दूध  निकलना चाहता है।

यहाँ जिस पुष्प और फल की बात कि गई है, वही वेदों का अर्थ है। यास्क इसे स्पष्ट करते हुए वेदमंत्र उद्धरण देता है – ज्ञदैवते पुष्पफले देवताध्यात्मेवा । इस मंत्र की पहली अभिव्यक्ति है – यज्ञज्ञान पुष्परूप है और देवताज्ञान फ़लरूप है। इस मंत्र की दूसरी अभिव्यक्ति है – पुष्प का अर्थ है कर्मकांडपरक अर्थ और फ़ल का अर्थ है तात्त्विक या आध्यात्मिक अर्थ। इससे यह स्पष्ट होता है कि वेदमंत्र कर्मकांड सम्बंधित अर्थों तक ही सीमित नहीं है। वेदमंत्रों का तात्त्विक या अध्यात्मिक अर्थ के रूप भी विस्तार होता है।

वेदों के त्रिविध अर्थ

त्रयोऽर्थाः सर्ववेदेषु दशार्थाः सर्वभारते ।

विष्णोः सहस्रनामापि  निरन्तरशतार्थकम् ॥ (स्कन्द पुराण)

वेदों के तीन प्रकार और महाभारत के दस प्रकार के के अर्थ है। विष्णु सहस्त्रनाम में प्रत्येक नाम के सो अर्थ है।

इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि वेदमंत्रों के तीन प्रकार के अर्थ – याज्ञिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक को जानना चाहिए। ऐसा व्यक्ति ही वेदों का वास्तविक ज्ञाता है। इन तीनों प्रकार के अर्थ जानकर ही वैदिक शास्त्रों में उपस्थित सारे विरोधाभास का निराकरण होता है। कुछ वेदभाष्यकारों ने एक प्रकार के अर्थ को ध्यान में लिया तो कुछ अन्य भाष्यकारों ने दुसरे अर्थ को ध्यान में लिया। आज से सात सौ वर्ष पूर्व श्रीपाद् मध्वाचार्य (1218-1317 AD) ने ऋग्वेद के चालीस सूक्तो पर भाष्य लिखकर, इसके रहस्य को उजागर किया है । उनका यह भाष्य कई महत्वपूर्ण प्रश्नों के सटीक उत्तर प्रदान करता है। श्रीपाद मध्वाचार्य के द्वारा ऋग्वेद भाष्य उसके याज्ञिक अर्थकों त्यागे बिना ही उसके आध्यात्मिक अर्थ को प्रस्तुत करता है। उनके द्वारा प्रस्तुत आध्यात्मिक या तात्त्विक अर्थघटन का आधार स्वयं वेद है।

इस विषय पर अधिक चर्चा करने के लिये संपर्क करें

डॉ. दामोदर चैतन्य दास , Mo. 8401943286, dcdas.bvks@gmail.com

 

 

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